जब भक्त ने पुकारा तो दौड़ी चली आई…

भक्त द्वारका

बहुत पुरानी बात है,
झुंझुनू शहर में
दादीजी के
एक परम भक्त
रहते थे,
नाम था द्वारकाजी I
द्वारकाजी
रोज सुबह उठ कर,
दैनिक कार्यों से
निपट कर,
दादीजी के मंदिर जाते थे,
और उनकी
पूरी निष्ठा से
पूजा-अर्चना
किया करते थे I
धीरे-धीरे
वक्त गुजरा,
द्वारकाजी
बूढ़े हो गये I
एक दिन वे
बहुत अधिक
बीमार पड़ गये,
उनके लिये
बिस्तर से उठना भी
मुश्किल हो गया था I
फिर भी
उन्होंने
जिद पकड़ ली,
कि उन्हें तो
दादीजी से मिलने
उनके मंदिर जाना है I

उनकी पत्नी ने
उनको
बहुत समझाया,
कि एक दिन
नहीं जाओगे
तो कोई
आसमान
नहीं टूट पड़ेगा,
लेकिन
वे
अपनी जिद पर अड़े रहेI
तब
उनकी पत्नी ने ताना मारा,
कि
“तबियत
आप की ख़राब है
आपकी
दादीजी की नहीं,
अगर उनको
आपसे
मिलना होगा
तो वे
ख़ुद भी चल कर
आ सकती हैI”
द्वारकाजी को
कोई जवाब
नही सूझा,
लेकिन
पत्नी की बात
उनके के दिल मे
बैठ गई I
उस दिन
वे
किसी तरह
गिरते-पड़ते
दादीजी के
मंदिर पहुँचे
लेकिन
तभी से
उनकी दिनचर्या मे
एक नया मोड़ आया
अब वे नियम से
दादीजी के मंदिर जाकर
उनकी चोखट पर
माथा टेककर,
कहने लगे,
“हे माई,
मैं रोज
तेरे मंदिर
आता हूं I
एक रोज
तू भी तो
मेरे घर आजा I
मेरी पत्नी को भी
लगे
कि तुम भी
मुझसे
मिलने के लिए
उतनी ही
बेचैन रहती हो
जितना मैं I”
द्वारकाजी ने
अपना नियम
कभी नही तोड़ा I
चाहे हारी हो
या बीमारी,
आंधी हो
या तूफान,
वे रोज नियम से
मंदिर जाते
और दादी जी को
अपने घर आने का
न्यौता दे आते I
एक दिन
दादी जी ने
उनकी सुन ली
वह अपने भक्त पर
मेहरबान हो गई I
उस दिन
एक ख़ास
घटना घटी
पूजा-पाठ के बाद
मंदिर मे ही
उनकी आँख
लग गई
उनको
एक सपना आया
सपने मे
उन्होंने देखा
दादीजी उनसे
कह रही है
“सुनो द्वारकाजी,
अगली अमावस की रात को
मैं आपके घर आऊँगी
और
रात का भोजन भी
आपके साथ करूगी I”
द्वारकाजी की ख़ुशी का
कोई ठिकाना न रहा I
उनके चेहरे पर
एक अजीब सी
शांति झलक आई
क्योंकि आज उनको
पहली बार लगा
कि माई ने
उनकी प्रार्थना
सुन ली हैI
घर आकर
उन्होंने ने यह बात
अपनी पत्नी को बताई I
पत्नी ने दूसरे को,
दूसरे ने तीसरे को,
और देखते-ही-देखते
जंगल की आग की तरह
यह बात
पूरे शहर में
फ़ैल गई
कि
अगली
अमावस की रात को
द्वारकाजी के घर
दादीजी आयेगी I
कुछ लोगों ने
इस बात का
मजाक उड़ाया
लेकिन कुछ लोग
ऐसे भी थे
जिन्होंने
इस बात को
बड़ी गंभीरता से लिया I
और वें
आने वाली
अमावस की रात का
बड़ी-बेसब्री से
इंतजार करने लगें I
अमावस की रात आई
द्वारकाजी ने
अपनी पूरी ताकत से
बहुत बढ़िया
इंतजाम किये I
बहुत सुंदर दरबार सजाया I
सुंदर-सी चाँदी की चौकी बनवाई
अच्छे-अच्छे पकवान बनवायें
और
दादीजी के आने का
इंतजार करने लगे I
धीरे-धीरे लोग
जमा होने लगे
उन्हें
दरबार की साज-सज्जा,
भक्त की तैयारी
और
उसका उत्साह देखकर
बहुत अच्छा
लग रहा था I
पूरे के पूरे शहर में
एक उत्सव का सा
माहौल बन गया था I
लोग कहने लगे,
“वाह द्वारकाजी,
दरबार तो
बहुत सुंदर सजाया I”
“हाँ ! मैंने जयपुर से
खास दरबार सजाने वाले
बुलावायें हैं”
द्वारकाजी ने
उनको
बड़े गर्व से
बताया I
“चाँदी की चौकी
तो
बहुत सुंदर बनवाई”
कुछ दूसरे लोगों ने कहा I
“चाँदी की चौकी
मैंने दिल्ली के खास
सर्राफा बाज़ार से
बनवाई है I”
द्वारकाजी ने
उनको भी
बहुत
खुश होकर बताया I
“पकवानों की खुशबू तो
बड़ी जबरदस्त आ रही है I”
कुछ लोग यह भी
कह रहे थे I
“मैंने कलकत्ता से
खास
छप्पनभोग बनाने वाले
हलवाई बुलवायें हैं I”
द्वारकाजी ने
उन्हें भी
बड़े गर्व से बताया I
धीरे-धीरे लोग आते रहे,
कुछ-न-कुछ कहते रहे I
द्वारकाजी फूलकर
कुप्पा होते रहे I
चारों ओर
उनकी
वाह-वाही के
डंके बज रहे थे I
वे लोगों की बातें
सुन-सुन कर
खुश हो रहे थे I
आज
जमीन पर
उनके
पाँव नहीं पड़ रहे थे I
इतनी ख़ुशी
शायद ही उनको
अपने जीवन में
इससे पहले
कभी हुई हो I
वे पूरी तरह
अपने
अहम मे चूर थे I
उनको
होश तब आया
जब
धीरे-धीरे
रात बीतने लगी
लेकिन
दादीजी का
कोई अत्ता-पत्ता नहीं था I
लोग
पंडाल के प्रवेश द्वार पर
टकटकी लगाये
उनके आने का
इंतजार करने लगे,
हर कोई
द्वारकाजी से
पूछ रहा था,
“द्वारकाजी !
थारी दादीजी
कहाँ रह गई ?
अब तक
आई
क्यों नहीं ?
द्वारकाजी की खुशियाँ
धीरे-धीरे
धराशायी होने लगी I
उनके चेहरे का
रंग उड़ने लगा
उनका मन
बेहद
बेचैन होने लगा I
वे सभी से
कह रहे थे,
“बस अभी
आती ही होगी I
थोड़ा सा
इंतजार
और कर लीजिये I”
इंतजार की घड़ियाँ
ख़त्म होने का
नाम ही
नहीं ले रही थी
आधी रात
होने को आई
लेकिन
दादीजी नहीं आई I
कुछ लोग
ताने मारने लगे
एक आदमी बोला
अरे द्वारकाजी,
आपकी दादीजी
कहाँ रह गई
और कितना
इंतजार करवाओगे ?
लोग
उनका मजाक
उड़ाने लगे
कुछ तो
कहने लगे
बड़े आए थे
दादीजी से
मिलवाने वाले
हमें तो
पहले ही
पता था,
कि
किसी ने नहीं आना I
सब ढोंग है,
दिखावा है I”
आँखों में
मोटे-मोटे
आँसू लिए
वे सब की बातें
सुन रहे थेI
लोगों की बातें
द्वारकाजी के दिल में
तीर-सी
चुभ रही थी
उनकी हालत
मौत से भी
बद्वतर थी I
उनका दिल
रो रहा था I
उनके जी में
आ-रहा था
कि
धरती फट जाए
और वह उसमे
समा जाए I
अब लोग
निराश हो-होकर
अपने-अपने घरों को
लौटने लगें I
द्वारकाजी
बेबस, बेउत्तर,
नजरें झुकाये
हाथ जोड़-जोड़ कर
सब को
विदा कर रहे थे I
बेहद दुखी मन से
वे
समझ नहीं पा रहे थे
कि आखिर
करे
तो क्या करे?
थक-हार कर
द्वारकाजी
दादीजी को
उनका वादा
याद दिलाने लगे:
“अमावस की है रात दादी…2
आज थान आणों थो,
अमावस की है रात I
अमावस की है, रात दादी,
आज थान आणों थो,
थान वाsssदो निभानो थो,
अमावस की है रात I1I
दरबार दादीजी
ऐसो सजो थारो,
कि बस गयो आँखों में I2I
चाँदी की चौकी पे
आसन सजो थारो,
थे क्यों नहीं
ग्रहण करयो I3I
जो कुछ बण्यो मुझसे
अर्पण करयो तुझको,
थे क्यों नहीं
स्वीकार करयो I4I
पूरी थी तैयारी
थारा भक्त था सारा,
थे क्यों नही
दर्श दियो I5I
द्वारकाजी दादीजी से पूछते है
हे माई
“क्या भूल हुई मुझसे
हूं भक्त तो थारो,
थे क्यों नहीं
माफ़ करयो I6I
द्वारकाजी
बेचैन हो गये
वे दादीजी से
कहते है,
“हे माई,
मैंने अपनी
पूरी सामर्थ्य से
सब कुछ किया है I
फिर भी
यदि कोई कमी
रह गई है
तो बता,
मैं
वह भी
अभी
पूरी कर देता हूँ I
बस तू
एकबार
आकर
अपने भक्तों के बीच
मेरी बात रख ले I
मेरी लाज रख ले I
धीरे-धीरे
पंडाल
ख़ाली हो गया
लोग
अपने-अपने घरों को
लौट गए I
अमावस की
काली रात थी I
चारों ओर
घोर अँधेरा
और सन्नाटा था I
सन्नाटे को चीरती हुई,
सांय-सांय करती
हवाएं भी
द्वारकाजी को
अपने उपर
कटाक्ष कसती
नज़र आ रही थी I
मानो
पूछ रही हो,
“क्या हुआ द्वारकाजी?
थारी दादीजी
कहाँ रह गई I “
अपमान और
तिरस्कार से घायल,
भूखे-प्यासे द्वारकाजी
निढाल होकर
वही पंडाल में
जमीन पर बैठ गए I
पत्नी के
लाख समझाने पर भी
अन्न का
एक दाना भी
मुंह से नहीं लगाया I
दुखी मन से
वे
आत्म-मंथन
करने लगे
कि आखिर क्यों?
दादीजी मेरे घर
क्यों नहीं आई?
उन्होंने तो
खुद
मुझसे कहा था
कि
अगली अमावस की रात को,
वे
मेरे घर आयेगी I
और
मेरे साथ
रात का
भोजन भी करेगी I
मुझसे
ऐसी कौनसी भूल होगई
जिसकी इतनी बड़ी सजा
मुझे
मिली है?
सारा का सारा शहर
मुझे
झूठा कह रहा है,
मुझ पर हँस रहा है
कुछ लोग तो मुझे
पाखंडी और ढोंगी
कह रहे है I
उनकी अंतरात्मा
उन्हें कचोटने लगी,
धिक्कारने लगी
कि क्यों उन्होंने
सारे शहर मे
बात फैलाई
कि
अगली अमावस की रात को
दादीजी
उसके घर आयेगी I

द्वारकाजी
बेहद दुखी मन से
दादीजी से कहते है:
” जब से होश संभाला मैंने,
तेरी चोखट पाई है,
तू ही पालनहारी मेरी,
तू ही तारिणीहारी है I1I
छोड़ के चलदी
अब क्यों मुझको,
जाऊ कहा बताती जा,
दोष मेरा क्या,
समझ न पाऊ,
इतना तो
समझाती जा I2I”
बेहद निराश
द्वारकाजी को
अपने
सवालों के
जवाब
नहीं मिलें
उनका मन
बहुत बेचैन
हो गया I
वे दादीजी से
कहते है:
“जीवनभर का साथ था…2
तुम्हारा-हमारा,
तुम्हाSSSरा हमारा
वादा कर के माई,
क्यों तुमने किया किनारा
जीवनभर का साथ था,
तुम्हारा-हमारा,
तुम्हाSSSरा हमारा I1I
जीवनभर के बंधन…2
यादों की दीवारें
तोड़ के इनको कैसे,
चैन से हम जी पाए
सोच-सोच के
तड़प रहा है,
मन तो आज हमारा
जीवनभर का साथ था,
तुम्हारा-हमारा,
तुम्हाSSSरा हमारा I2I
अब तक
आधी रात
बीत चुकी थी I
चारों ओर
घोर सन्नाटा था I
लेकिन
द्वारकाजी के दिल में तो
उथल-पुथल मची थी
उनको
अभी भी
विश्वास नहीं हो रहा था
कि मेरी माई
मुझको
इस तरह
मँझधार में छोड़ देगी I
जरा-सी
आहट भी
उनका ध्यान
मुख्य दरवाजे
की ओर खींच रही थी,
कि
कहीं मेरी माई
आ तो
नहीं गई I
“जरा-सी आहट भी…2
होती है
तो दिल
कहता है
कही मेरी माई तो नहींSSS
कही मेरी माईSSS तोSS नहीं”
तभी
सन्नाटे को चीरती हुई
‘थप-थप’ की आवाजें
कानों में पड़ती है
लग रहा था,
मानो
कोई दरवाजे पर
दस्तक
दे रहा हैI
द्वारकाजी की पत्नी
कहती है,
“भगतजी उठो,
जाकर देखो,
दरवाजे पर
कोई है I
शायद
कोई भगत
राह भटक कर
इधर आगया हैI”
अब
फिर
किसी भगत की
खरी-खोटी
सुनने को मिलेगी,
यह सोच कर,
न चाहते हुए भी
द्वारकाजी
बुझे मन से
उठते है,
और जाकर
दरवाजा खोलते है I
दरवाजा खोलते ही
वे
दंग रह जाते है I
लाल चुनरिया में
सजी-धजी
वही माई
उनके
दरवाजे पर खड़ी है,
जिनके दर्शन
हर रोज
वे
झुंझुनू-मंदिर में
किया करते थे I
जिनको
वे
रोज
अपने घर आने का
न्यौता दिया करते थे I
जिन्होंने उनसे
कहा था,
कि
अगली अमावस की रात को
वह उनके घर आयेगी
और रात का भोजन भी
उनके साथ करेगी I
वे
उनके अनुपम सौन्दर्य को
निहारते ही रह गये
उनके माथे की बिंदिया
चंदा सी
चमक रही थी I
हाथों में रची
मेहंदी से
पूरा आँगन
महक रहा था I
उनके
मुख-मंडल का तेज,
चारों दिशाओं को
प्रकाशित कर रहा था I
ऐसा लग रहा था,
मानो
भोर का सूरज
आधी रात को ही
द्वारकाजी के
घर से निकल रहा हैI

द्वारकाजी को
समझते देर न लगी
वे समझ गये,
कि
उनकी पुकार
उनकी प्रार्थना
सुन ली गई है
देर से ही सही
उनकी माई
उनके घर आ गई है I
वे घुटनों के बल बैठ गये I
अपना सिर
उनके
चरणों में रख दिया
उनका दिल
भर आया
और वे
फूट-फूट कर
रोने लगे
दादीजी ने
अपने हाथों से
उनको उठाया I
अपने कलेजे से लगाया I
और अपने आंचल से
उनके आंसू
पोंछने लगी I
द्वारकाजी
धीरे-धीरे
सहज होने लगे
लेकिन
उनके दिल में
एक बात
अब भी
खटक रही थी I
वे रो-रो के,
माई से कहते है,
भक्त रो-रो के
माई से
कहने लगा… 2
अब आई हो,
पहले क्यों
आई नहीं …2
तेरे भक्तों ने…2
मुझको रुलाया बहुत,
थोड़ी भी दया
उनको आई नहीं
भक्त रो-रो के I
द्वारकाजी ने
माई से पूछा
“हे माई,
इतना तो बताओ,
तुम अब आई हो,
पहले क्यों नहीं आई?
अगर पहले आ जाती
तो
तेरे भक्तों के बीच
मेरी लाज बनी रहती I
मेरी बात बनी रहती I
द्वारकाजी कहते है,
“मुझे इतना तो पता था,
कि तुम ज़रूर आओगी I
मैंने तो
बचपन से
यही सुना है
कि
तू अपने भक्तों की
बात रखती है
उनसे किये वादे
पूरे करती है
लेकिन
तुम
इस तरह आओगी,
यह देख कर
मैं हैरान हूं

अब दादीजी कहती है
सुनो द्वारकाजी,
“मैं तो
आपके घर की
चोखट पर
गोधूली से ही
खड़ी हूँ I
आपसे मिलने के लिए
व्याकुल थी,
बेचैन थी I
भूखी-प्यासी
घर से
यह सोचकर
निकली थी,
कि आज तो
द्वारकाजी के
घर जाकर कर ही
भोजन करुगी I
लेकिन
मेरा नसीब तो देखो
आधी रात बीत गई
मैं तो
अभी तक
भूखी-प्यासी
अपने वादे से बंधी
आपके घर की
चोखट पर
खड़ी हूँ
यह सोच-सोच कर
मन को
समझाती रही हूँ,
कि
कभी तो
मेरे भक्त को
मेरा ख्याल
आएगा I
उसे याद आएगा
कि आज उसने
अपनी माई को
अपने घर
भोजन के लिए
बुलाया है
लेकिन आप तो
बड़े
खुदगर्ज़ निकले I
अपनी प्रसन्नता
सुन-सुन कर
अपने अहम में
चूर होते रहे I
मैंने यह किया,
मैंने वह किया
में उलझ कर,
आप तो
भूल ही गये
कि
आज आपने
मुझे
अपने घर
भोजन के लिए
बुलाया है I”
अब
दादीजी की आँखों में
मोटे-मोटे आँसू थे I

द्वारकाजी पर मानो
बिजली सी गिरी
उनको
अपनी भूल का
एहसास हो गया I
वे कहने लगे
“हे माई,
मैं लोगों की बातें
सुन-सुन कर
भटक गया था I
मुझे तो होश
तब आया
जब लोग
मुझसे पूछने लगे
कि
आधी रात हो गई
द्वारकाजी
थारी दादीजी
अब तक
क्यों नहीं आई ?
उनको कबीर साहिब की
कही बात याद आगई
कबीर साहिब कहा करते थे
“किया कराया सब गया,
जब आया अहंकार”
वे आत्मग्लानी से
भर उठे I
और
बार-बार
दादीजी से
अपनी भूल के लिए
क्षमा मांगने लगे I
दादीजी ने
द्वारकाजी को
क्षमा कर दिया
कहने लगी,
“द्वारकाजी,
मैं तो
आपकी भक्ति से
पहले से ही
खुश थी,
तभी तो
भूखी-प्यासी
रह कर भी,
आपके घर की
चौखट पर
अब तक
खड़ी हूँ I
जो भूल
आप से हुई है,
उसे मैं
कब का भूल चुकी I
कुछ ही देर मे
आपके घर
लोग
फिर से जमा होगेंI
वें आप से पूछेगे,
कि
आधी रात को
द्वारकाजी
आपके घर
यह प्रकाश कैसा था ?
उन से कहना
मेरी
माई आई थी I
यह प्रकाश उन्ही का था I
लोगों में
आपका खोया विश्वास
फिर से
लोट आएगा I”
मेरे प्रिय भक्त-जनों,
जीवन में अहंकार
ईश्वर-प्राप्ति में
सबसे बड़ी रूकावट है I
मन के अंदर
‘मैं’ का आना,
हमें ईश्वर से
मिलने नहीं देता I
एकबार
कौशल्या माता के
पूछने पर
भगवान श्रीराम
ने कहा था
हे माते,
रावण को
मैंने नहीं मारा
उसके ‘मैं’ ने ही
उसे मार डाला I

भक्त द्वारकाजी
झुंझुनू निवासी
श्री द्वारका दास जी
तुलस्यान थे I
वे
दादीजी के
सच्चे भक्त थे I

उन दिनों
झुंझुनू में
शहर के
आखिरी छोर पर
दादीजी का
एक
छोटा-सा मंदिर
हुआ करता था
वे ता-उम्र,
उस मंदिर के
बाहर
चौकी लगाकर
मंदिर के
विकास कार्यों के लिए
लोगों को प्रेरित करते रहे I
कुछ साल
पहले तक
दादीजी के
झुंझुनू-मंदिर में
एक पुस्तकालय
हुआ करता था I
उसमे द्वारकाजी का
एक बड़ा सा
छायाचित्र लगा था I
वक़्त का फेर देखिए,
आज
न तो वह पुस्तकालय रहा
और न ही उसमें लगा
उनका वह छायाचित्र I
दोनों ही
किसी की
“मैं” के भेंट चढ़ गए I

झुंझुनू के
छावनी बाज़ार में,
मोदी गढ़
के सामने
वह हवेली
आज भी मौजूद है
जिसमें एकबार
भक्त द्वारकाजी के
बहुत अधिक
बीमार पड़ जाने पर
दादीजी स्वयं
उनसे
मिलने आई थी I

उनकी धर्म-पत्नी
श्रीमती मणि बाई
अक्सर इस घटना का
जिक्र किया करती थी I
मेरे प्रिय भक्त-जनों,
मुझे पूर्ण विश्वास है कि भक्त द्वारकाजी के जीवन में घटी यह सत्य एवं प्रेरणादायक घटना ने आपके हृदय को अवश्य स्पर्श किया होगा तथा दादीजी के प्रति आपकी श्रद्धा और विश्वास को और अधिक दृढ़ किया होगा।
यदि इस घटना ने आपके हृदय में भक्ति और विश्वास का संचार किया हो, तो इस चैनल को सब्सक्राइब करें, बेल आइकॉन को अवश्य दबाएँ, और इस वीडियो को लाइक एवं शेयर करके अधिक से अधिक भक्तों तक दादीजी की महिमा पहुंचाने का पुण्य कार्य अवश्य करें।
कमेंट बॉक्स में “जय दादी की” अवश्य लिखें और अपना नाम तथा उस शहर का नाम भी लिखें जहाँ से आप यह वीडियो देख रहे हैं।
दादीजी अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं। जो भक्त सच्चे मन से उनका स्मरण करते हैं, दादीजी उसकी पुकार अवश्य सुनती हैं। उनकी कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं और जीवन में एक नई आशा का संचार होता है।
दादीजी की असीम कृपा, स्नेह और आशीर्वाद आप एवं आपके पूरे परिवार पर सदैव बना रहे।
॥ जय दादी की ॥

यह वीडियो श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ मेरे पूजनीय पिताश्री, महान समाजसेवी झुंझुनू निवासी श्री बनवारी लाल जी तुलस्यान तथा मेरी पूज्य माताश्री श्रीमती पाना देवी को सादर समर्पित है।






































