भक्ति गीत

पायलियाँ छम-छम बाजत हैं
पायलियाँ छम-छम बाजत हैं,
मन की आँखों से देख रहा मैं।
मन की आँखों से देख रहा मैं,
दादीजी मेरे संग-संग नाचत हैं ॥1॥
ढोल-मंजीरेSSS गूँजत हैं,
घंटा-घड़ियाल भी बाजत हैं।
दूर-दूर से आई संगत,
तेरी जय-जयकार लगावत है॥2॥
भक्ति का अनुपम उत्सव है,
भक्ति-रस की बारिश है।
झुंझुनू की पावन धरती भी
तेरी महिमा गावत हैI
मंद-मंद मुस्काती दादीजी,
सबको खुशियाँ बाँटत हैं॥3॥
पायलियाँ छम-छम बाजत हैं,
मन की आँखों से देख रहा मैं।
मन की आँखों से देख रहा मैं,
दादीजी मेरे संग-संग नाचत हैं॥
भजन का भावार्थ
यह भजन एक भक्त की उस दिव्य अनुभूति का वर्णन करता है, जिसमें वह अपनी कुलदेवी दादीजी की कृपा और सान्निध्य को बाहरी आँखों से नहीं, बल्कि मन की आँखों से अनुभव करता है।
मुखड़े का भावार्थ
भक्त कहता है कि दादीजी की पायलियों की मधुर छम-छम ध्वनि उसके हृदय में गूँज रही है। वह अपनी अंतर्दृष्टि से देख रहा है कि दादीजी स्वयं उसके साथ आनंदपूर्वक नृत्य कर रही हैं। यह उनकी कृपा, स्नेह और भक्त के साथ सदैव उपस्थित रहने का प्रतीक है।
प्रथम अंतरे का भावार्थ
ढोल, मंजीरे, घंटा और घड़ियाल की मंगलध्वनि से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा है। दूर-दूर से आए श्रद्धालु एक स्वर में दादीजी का जयघोष कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा संसार उनकी महिमा का गुणगान कर रहा हो।
द्वितीय अंतरे का भावार्थ
जहाँ दादीजी का सान्निध्य होता है, वहाँ भक्ति का उत्सव और आनंद की वर्षा होने लगती है। दादीजी अपनी मधुर मुस्कान से भक्तों के जीवन में सुख, शांति, आशा और प्रसन्नता का संचार करती हैं तथा सभी पर अपनी कृपा बरसाती हैं।
यह भजन सिखाता है कि जब भक्त का हृदय श्रद्धा, प्रेम और विश्वास से भर जाता है, तब वह हर क्षण अपनी कुलदेवी की उपस्थिति का अनुभव करता है। दादीजी अपने भक्तों को भक्ति, आनंद, साहस और कृपा का अमूल्य उपहार प्रदान करती हैं तथा उनके जीवन को मंगलमय बना देती हैं।
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मुझे भूल न जाना, माई
मुझे भूल न जाना, माई,
सदा ही तुझे याद करूँ।
तू ही तो मेरी जीवन-धारा,
तुझसे कभी न करूँ किनारा।
तुझसे ही प्रीत लगाई,
सदा ही तुझे याद करूँ॥
जब-जब मेरा मन घबराया,
तेरा ही आँचल मुझे याद आया।
सूनी राहों में बनकर साया,
तूने ही मेरा साथ निभाया।
कुछ भी न भूलूँ, माई,
सदा ही तुझे याद करूँ॥
लाखों तेरे भक्त हैं मैया
लाखों तेरे भक्त हैं मैया,
उनमें से एक मैं भी हूँ।
थोड़ी दया मुझ पर भी करना,
मैं भी तेरा बालक हूँ ।।
तेरे नाम का दीप जलाऊँ,
सुबह-शाम तुझे याद करूँ।
तेरे चरणों में बस जाऊँ,
भवसागर को पार करूँ।।
तेरी महिमा अपरम्पार है,
जग में तेरा नाम बड़ा।
जो भी तेरी शरण में आया,
उसका तूने भाग्य संवारा।।
झोली मेरी खाली मैया,
तेरे दर पर लेकर आया हूँ।
प्रेम-भक्ति का दान दे मुझको,
बस यही माँगने आया हूँ।।
सुख में तेरा नाम न भूलूँ,
दुख में तुझको पुकारूँ मैं।
जीवन के हर एक पल में,
तेरा ही गुणगान करूँ मैं।।
जब तक साँसें चलती जाएँ,
तेरा ही ध्यान लगाऊँ मैं।
अंत समय जब आए मैया,
चरणों में तेरे समाऊँ मैं।।
लाखों तेरे भक्त हैं मैया,
उनमें से एक मैं भी हूँ।
थोड़ी दया करना मुझ पर भी,
तेरे दर्शन का प्यासा हूँ।।
भावार्थ
इस भजन में भक्त माँ से विनम्र प्रार्थना करता है कि संसार में उनके लाखों भक्त हैं, पर वह भी उन्हीं में से एक छोटा-सा भक्त है। वह माँ से कृपा और दर्शन की याचना करता है। भक्त कहता है कि वह प्रतिदिन माँ के नाम का दीप जलाकर उनका स्मरण करेगा और उनके चरणों में स्थान पाकर जीवन रूपी भवसागर से पार होना चाहता है।
आगे वह माँ की असीम महिमा का वर्णन करता है और स्वीकार करता है कि जो भी सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, माँ उसकी रक्षा करती हैं। भक्त धन-दौलत नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और सद्बुद्धि का वरदान माँगता है। अंत में वह प्रार्थना करता है कि जीवन के हर सुख-दुःख में माँ का स्मरण बना रहे और मृत्यु के समय उसे माँ के चरणों में स्थान प्राप्त हो जाए।
मुख्य संदेश:
सच्ची भक्ति, विनम्रता, समर्पण और माँ के प्रति अटूट विश्वास ही इस भजन का मूल भाव है। 🙏🌹॥ जय दादीजी झुंझुनू वाली ॥
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(तर्ज़ : साथिया नहीं जाना)
दादीजी अब तो आओ…
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मंदिर-मंदिर ढूंढा मुझको…
मंदिर-मंदिर ढूंढा मुझको,
अब मन-मंदिर में भी ढूंढ मुझे।
मैं तो तेरे हृदय में विराजूँ,
प्रेम-नयनों से ढूंढ मुझे।1।
हर कण में बसती हूँ मैं तो,
हर प्राणी में रूप है मेरा।
प्रेम जहाँ निष्काम बहत है
वहीं बसेरा है मेरा I2I
जग के मेले, जग की माया,
इनमें क्यों तू खोया रे?
सुख-दुःख तो हैं आने-जाने,
नाम मेरा जप भक्तों रे।3।
जब-जब तुझ पर संकट आया,
तेरे साथ खड़ी थी, भक्त मेरे।
पढ़ ली तेरे हर आँसू की भाषा,
तेरे बिन बोले ही, भक्त मेरे।4।
झुंझुनू वाली दादीजी मेरी,
सबकी लाज बचाती हैं।
जो भी सच्चे मन से ध्यावे,
उस पर कृपा बरसाती हैं।5।
विस्तृत भावार्थ
1. “मंदिर-मंदिर ढूंढा मुझको…”
दादीजी कहती हैं कि भक्त मुझे बाहर के मंदिरों, तीर्थों और मूर्तियों में तो खोज लिया है, अब मुझे अपने हृदय में भी खोजें I मेरा निवास उसके हृदय में भी है। यदि प्रेम और श्रद्धा की दृष्टि से देखेगा, तो मुझे अपने भीतर ही अनुभव कर लेगा।
2. “हर कण में बसती हूँ मैं तो, हर प्राणी में रूप मेरा…”
दादीजी बताती हैं कि मैं केवल किसी एक स्थान या मूर्ति तक सीमित नहीं हूँ। सृष्टि के प्रत्येक कण में मेरी शक्ति विद्यमान है। हर जीव में मेरा अंश है।
यदि कोई भूखे को भोजन कराता है, दुखी को सांत्वना देता है या किसी की सहायता करता है, तो वह वास्तव में मेरी ही सेवा करता है।
संदेश: समस्त जीवों में ईश्वर का अंश देखो।
3. “जग के मेले, जग की माया…”
दादीजी समझाती हैं कि संसार की माया, धन, पद और प्रतिष्ठा क्षणिक हैं। मनुष्य इन्हीं में उलझकर अपना वास्तविक लक्ष्य भूल जाता है।
सुख और दुःख दोनों ही स्थायी नहीं हैं। जीवन में परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, इसलिए उनका अधिक अहंकार या शोक नहीं करना चाहिए।
संदेश: संसार अस्थायी है, नाम-स्मरण ही स्थायी सहारा है।
4. “जब-जब संकट तुझ पर आया…
यहाँ दादीजी अपने भक्त को आश्वस्त करती हैं कि जब-जब वह संकट में पड़ा, तब-तब मैं उसके साथ थी। भले ही उसे मेरा प्रत्यक्ष दर्शन न हुआ हो, परन्तु मेरी कृपा सदैव उसके साथ रही।
भक्त के आँसू, उसकी पीड़ा और उसकी मौन प्रार्थना को भी दादीजी समझ लेती हैं।
संदेश: सच्चे भक्त की पुकार बिना शब्दों के भी भगवान तक पहुँच जाती है।
5. “झुंझुनू वाली दादीजी मेरी…”
अंतिम पद में भक्त अपने अनुभव से कहता है कि झुंझुनू वाली दादीजी अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। जो व्यक्ति निष्कपट भाव से उनका स्मरण करता है, उसकी रक्षा, सहायता और मार्गदर्शन करती हैं।
संदेश: सच्ची श्रद्धा और निष्काम भक्ति पर दादीजी की कृपा अवश्य बरसती है।
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माँ, आती है मुझे तेरी याद, एक बार आजा ओ…
माँ, आती है मुझे तेरी याद, एक बार आजा ओ,
माँ, आती है मुझे तेरी याद, एक बार आजा ओ ।।
दिल कब से तुझको ढूँढे, एक आस मन में लेकर,
आँखें भी थक गई हैं, अब इंतज़ार कर के।
एक आस रह गई है, वो भी न टूट जाए,
माँ, आती है मुझे तेरी याद, एक बार आओ।।1।।
पल-पल घट रही हैं, साँसें ज़िंदगी की,
चार दिन का मेला, फिर इंतहा है ज़िंदगी की।
दो घड़ी को हम भी मिल ले, यही आरज़ू है दिल की,
माँ, आती है मुझे तेरी याद, एक बार आजा ओ।।2।।

तुम संग लगन लगाई मैया…
तुम संग लगन लगाई मैया,
तुम संग लगन लगाई मैया।
मैया मेरी…॥1॥
आओ थारे हाथों में मेहंदी लगाऊँ,
गोरी-गोरी बाँहों में कंगना पहनाऊँ।
कजरारी आँखों में कजरा लगाऊँ,
चंदा सी प्यारी बिंदिया सजाऊँ।
एक तू ही मन को भायी है मैया,
मैया मेरी…॥2॥
प्रेम से तूने मुझे अपना बनाया,
अंधियारी राहों में चलना सिखाया।
दुःख और सुख में सदा साथ निभाया,
हर पल मुझ पर अपना प्यार लुटाया।
तुझको कभी न भूलूँ मैया,
मैया मेरी…॥3॥
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जब से तुमसे लगन लगी है,
जब से तुमसे लगन लगी है,
तुझे याद करूँ मेरी माई,
तुझे याद करूँ मेरी माई। ॥1॥
सपनों में तेरे संग नाचूँ-गाऊँ,
नींद खुले तो मिले तन्हाई है।
एक बार आ जा, दर्शन दे जा,
मुझसे कैसी रुसवाई है। ॥2॥
मेरा दिल भी है तेरा, जान भी तेरी,
जब से तुमसे प्रीत लगाई।
कहाँ रह गई कमी भक्ति में मेरी,
इतना तो बता हे पालनहारी ॥3॥
तेरे बिन अब कुछ न सुहाए,
हर पल तेरी याद सताए।
नैन बिछाए राह निहारूँ,
आ जा माई, क्यों देर लगाए। ॥4॥
यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि एक ऐसे भक्त के हृदय की पुकार है जिसकी आत्मा अपनी कुलदेवी के प्रेम में पूरी तरह डूब चुकी है। यह भजन उस विरह-वेदना को व्यक्त करता है, जो तब उत्पन्न होती है जब भक्त का मन हर क्षण अपने आराध्य में लगा रहता है, परन्तु उसे अभी तक वह प्रत्यक्ष अनुभूति या दर्शन प्राप्त नहीं हुए जिनकी उसे प्रतीक्षा है।
भावार्थ
“जब से तुमसे लगन लगी है, तुझे याद करूँ मेरी माई…”
भक्त कहता है कि हे मेरी दादी माँ! जब से मेरे हृदय में आपके प्रति प्रेम और श्रद्धा का दीप जला है, तब से मेरा मन संसार की बातों में नहीं लगता। मेरे विचार, मेरी भावनाएँ और मेरी स्मृतियाँ हर समय आपकी ओर ही दौड़ती रहती हैं। मेरा जीवन आपकी यादों का पर्याय बन गया है।
“सपनों में तेरे संग नाचूँ-गाऊँ, नींद खुले तो मिले तन्हाई है…”
यहाँ भक्त की तड़प और भी गहरी हो जाती है। उसे सपनों में ऐसा लगता है मानो वह अपनी माँ के सान्निध्य में है, उनके साथ आनंद मना रहा है, उनसे बातें कर रहा है। लेकिन जैसे ही आँख खुलती है, वह स्वयं को अकेला पाता है। यह जागृति उसे फिर से उस विरह की अनुभूति करा देती है, जिसे वह हर दिन जी रहा है।
“एक बार आ जा, दर्शन दे जा, मुझसे कैसी रुसवाई है…”
भक्त अपनी कुलदेवी से प्रेमपूर्ण शिकायत करता है। वह पूछता है—हे माँ! यदि मैं आपका पुत्र हूँ, यदि मेरा प्रेम सच्चा है, तो फिर आप मुझसे इतनी दूर क्यों हैं? क्या मुझसे कोई भूल हो गई है? यदि हुई है तो मुझे बता दीजिए, परन्तु यूँ मौन रहकर मुझे अपने दर्शन से वंचित मत रखिए।
“मेरा दिल भी है तेरा जान भी तेरी, जब से तुमसे प्रीत लगाई…”
यह प्रेम साधारण नहीं है। यह वह अवस्था है जहाँ भक्त का मन संसार की सुख-सुविधाओं से ऊपर उठने लगता है। उसे अब किसी वस्तु, पद, सम्मान या भौतिक उपलब्धि में आनंद नहीं मिलता। उसके हृदय को केवल अपनी माँ की निकटता चाहिए। उसका मन अब उसी प्रेम का दीवाना बन चुका है।
“कहाँ रह गई कमी भक्ति में मेरी, इतना तो बता, हे पालनहारी…”
यह पंक्ति भजन का सबसे मार्मिक भाव है। भक्त स्वयं को दोष देता है। वह माँ से प्रश्न करता है—यदि अभी भी मुझे आपकी अनुभूति नहीं हो रही, तो अवश्य ही मेरी भक्ति में कोई कमी रह गई होगी। हे पालनहार माँ! मुझे मेरी भूल बता दो, ताकि मैं उसे सुधार सकूँ। मैं आपको दोष नहीं देता, बल्कि अपने भीतर झाँककर स्वयं को सुधारना चाहता हूँ।
समग्र भाव
इस पूरे भजन में कहीं भी क्रोध, अहंकार या शिकायत का कटु भाव नहीं है। यहाँ केवल एक संतान का अपनी माँ के प्रति निष्कलंक प्रेम, विरह और समर्पण है। भक्त अपनी कुलदेवी से कोई धन, वैभव या चमत्कार नहीं माँगता। उसकी एकमात्र अभिलाषा है कि उसकी माँ उसे अपना स्नेह, अपनी उपस्थिति और अपने दर्शन का अनुभव करा दें।
यह भजन उस स्थिति का चित्रण करता है जहाँ भक्त के लिए भक्ति केवल पूजा-पाठ नहीं रह जाती, बल्कि साँसों की तरह अनिवार्य हो जाती है। वह हर पल अपनी माँ को पुकारता है और उसी प्रतीक्षा में जीता है कि एक दिन उसकी दादी माँ उसकी पुकार सुनकर उसके हृदय को अपनी कृपा से भर देंगी।
संक्षेप में, यह भजन एक भक्त की अपनी कुलदेवी के प्रति अटूट प्रेम, गहन विरह, आत्मचिंतन और पूर्ण समर्पण की करुण तथा मधुर अभिव्यक्ति है। इसमें दर्शन की माँग से अधिक माँ के प्रेम की प्यास बोलती है।
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सारी-सारी रात मुझे नींद न आए…
सारी-सारी रात मुझे नींद न आए
याद सताए तेरी, बड़ा तड़पाए रे,
नींद न आए,
सारी-सारी रात मुझे नींद न आए।1I
लगन लगी कि हुआ दिल तो पराया,
दिल तुझसे कौन मिलाए ?
कौन मिलाए, कोई यह तो बताए रे,
नींद न आए,
सारी-सारी रात मुझे नींद न आए।
जैसे-जैसे माई मेरी बीते उमरिया,
मिलने की तुझसे तड़प रुलाए रे,
कैसे मिलन हो, तू ही बता दे,
चैन न आए मेरा, दिल घबराए रे,
नींद न आए,
सारी-सारी रात मुझे नींद न आए।
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तुझसे मिलने का बने मौसम…
तुझसे मिलने का बने मौसम, दादीजी कृपा करना।
मेरा दिल भी है तेरा दीवाना, इसकी भी खबर लेना॥1॥
ये तो तेरे प्रेम का प्यासा है, समझाऊँ तो समझे ना।
ऐसी आग लगी है दिल में, बुझाऊँ तो बुझे ना।
उल्फत की ऐसी उलझन, सुलझाने की कृपा करना।
ये तो तेरे प्रेम का प्यासा है, मिलने की कृपा करना॥2॥
तुझसे मिलने की ख्वाहिश में, दिल थाम के रोते हैं।
कर जोड़ तेरी तस्वीर से हम, दिल की बातें करते हैं।
तेरी नज़रें हों हम पर नरम, मिलने की कृपा करना॥3॥
तुझसे मिलने का बने मौसम, दादीजी कृपा करना I
सरल भाषा में व्याख्या
इस भजन में एक भक्त अपनी कुल देवी दादीजी से केवल धन, वैभव या सांसारिक सुख नहीं माँग रहा है। वह देवी के प्रेम, कृपा और सान्निध्य की याचना कर रहा है।
प्रथम अंतरा
“तुझसे मिलने का बने मौसम…”
भक्त कहता है कि हे दादीजी! ऐसा शुभ समय आए जब मुझे आपके दर्शन और आपका सान्निध्य प्राप्त हो। मेरा हृदय आपका दीवाना है, इसलिए मेरी भावनाओं को समझकर मुझ पर कृपा करें।
द्वितीय अंतरा
“ये तो तेरे प्रेम का प्यासा…”
भक्त का मन देवी के प्रेम के लिए व्याकुल है। वह जितना अपने मन को समझाने का प्रयास करता है, उतनी ही उसकी तड़प बढ़ती जाती है। देवी के प्रति प्रेम ने उसके हृदय में ऐसी लगन जगा दी है जो किसी भी सांसारिक वस्तु से शांत नहीं होती। इसलिए वह देवी से प्रार्थना करता है कि उसकी इस प्रेममयी व्याकुलता को शांत करें और उसे अपने दर्शन का सुख दें।
तृतीय अंतरा
“तुझसे मिलने की ख्वाहिश में…”
भक्त कहता है कि आपकी याद में उसकी आँखें नम हो जाती हैं। वह आपकी तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर अपने मन की सारी बातें कहता है। अंत में वह विनती करता है कि दादीजी अपनी कृपादृष्टि उस पर बनाए रखें और उसे अपने प्रेम व दर्शन का आशीर्वाद दें।
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प्रस्तुत भजन में भक्त अपनी कुलदेवी को अपनी अंतिम शरण, अपनी मंज़िल और अपने जीवन का आधार मानकर पुकार रहा है। वह कहता है:
तेरे बिना माई, चैन हमें ना आए रे…
तेरे बिना माई, चैन हमें ना आए रे,
तुमसे मिलने हम द्वार तेरे आए रे।
क्योंकि तुम ही तो हो मंज़िल मेरी,
तेरे बिना माई, चैन हमें ना आए रे ॥1॥
दिल ने कहा तो हम तेरे द्वारे आ गए,
अब नज़र चुराकर दूर ना हमसे जा पाओगे।
नज़र उठाओगी तो सामने हमको ही पाओगे,
तेरे बिना माई, चैन हमें ना आए रे ॥2॥
नाम होठों पे तुम्हारा ही रहता है,
क्योंकि तुम ही तो हो मंज़िल मेरी।
ज़िंदगी भी तुमसे ही है माई मेरी,
तुम ही बताओ, चैन कहाँ हम पायेंगे
तेरे बिना माई, चैन हमें ना आए रे ॥3॥
1. मेरे दिल में तेरा नाम

2. एक भक्त के जीवन में कुछ उतार-चढ़ाव आ जाता है I उसे लगने लगा, कि माई उससे रूठ गई है I वह उनको मनाने उनके मंदिर जाता है, और कहता है:
2. मैं तो आया तुझे मनाने, द्वार खड़ा तेरे दादीजी
एक भक्त के जीवन में कुछ उतार-चढ़ाव आ जाता है I उसे लगने लगा, कि माई उससे रूठ गई है I वह उनको मनाने उनके मंदिर जाता है, और कहता है:
मैं तो आया तुझे मनाने, द्वार खड़ा तेरे दादीजी
नज़र उठा कर देख जरा तो, तेरा भक्त खड़ा है दादीजी I1I
मैं तो तेरा भक्त पुराना, मुझसे क्यों रूठी दादीजी
भूल गई क्यों मुझको माई, तड़प रहा दिल दादीजी I2I
तूने दिया है साथ हमेशा, बिगड़ी बात बनाई है
तेरा मुझ पर कर्ज बहुत है, मेरा जीवन करजाई है I3I
3. ओं तनधन की प्रेम दीवानी

प्रस्तुत गीत एक ऐसे भक्त के हृदय की पुकार है, जो बचपन से ही अपनी आराध्या राणी सती दादी के प्रेम और भक्ति में पूर्णतः समर्पित हो चुका था। दादी की दिव्य मूरत, उनकी कृपा और चरणों से जुड़े इस प्रेम में भक्त को संसार का हर सुख छोटा प्रतीत होता था। “ओं तनधन की प्रेम दीवानी” केवल एक भजन नहीं, बल्कि भक्त और दादी के बीच अटूट श्रद्धा, प्रेम और आत्मसमर्पण की भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। आईये, सुनते है:
ओं तनधन की प्रेम दीवानी, तुझसे लगन लगाई रे
जब से होश-संभाला मैंने, तेरे दर पे आई रे I1I
तेरे द्वारे मन लाग्यों मेरो , ना छोडू अब माई रे,
मन की आँखों से जब भी देखूँ, पाऊँ तुझको संग में रे I2I
तेरी मूरत प्यारी लागे, दुनिया में सबसे न्यारी रे,
बार-बार मैं इसे निहारूँ, मन नहीं भरता माई रे I3I
तुझ बिन मेरा मोल ना कोई, मेरा जीवन तेरा रे,
चरणों में बस जाऊँ तेरे, जीवन सफल हो जाई रे I4I
3. आज फिर दिल ने तुझे याद किया है
मेरी बिगड़ी बनाने वाली
आज फिर दिल ने, तुझे याद किया है,
मेरी बिगड़ी बन गई तो…ओ…
मेरी बिगड़ी जो बन गई तो, तेरा ख़याल आया है
आज फिर दिल ने, तुझे याद किया है,
आँखों से तो देखा नहीं, महसूस किया है
मेरी बिगड़ी जो बन गई तो, महसूस किया है
आज फिर दिल ने, दादीजी, तुझे याद किया है,
मन की दो बातें तुझसे करलूँ , मन में आया है I
मैंने सांसों में तेरा ना…म बसाया है
तेरे आँगन में बैठू तो, सुकून मिलता है
तेरा आँचल है, मेरे सिर पर, मुझे लगता है
आज फिर दिल ने, दादीजी, तुझे याद किया है,
आज फिर दिल ने तुझे याद किया है
बड़ी शिद्दत से दिल ने तुझे याद किया है
मेरी सांसों ने भी, तेरा ही नाम लिया है
दो घड़ी चरणों में, तेरे बैठूँ तो मुझे चैन मिले
बड़ी शिद्दत से मेरे मन में ख़याल आया है
तेरे चरणों में ठहरजाऊँ तो मुझे चैन मिले
तेरी नगरी में बसजाऊँ तो मुझे चैन मिले
मेरे कुल की देवी हो तुम, तुझसे रिश्ता पुराना है
जब से सूरज-चाँद धरा पर, तबसे तुझसे नाता है
4. रे मन तू दादी-दादी बोल…

रे मन तू दादी-दादी बोल…
रे मन तू दादी-दादी बोल…
रोम-रोम में तेरे, दादी बसी है,
मन की आंखें खोल
रे मन तू दादी-दादी बोल ।1l
मन-मन्दिर में दीप जलाकर
दादी-दादी बोल, रे मन तू दादी-दादी बोल l2l
जितनी तेरी बिती उमरिया,
क्या पाया अनमोल, बता रे, क्या पाया अनमोल
रे मन तू दादी-दादी बोल ।3l
धन-दौलत तूने बहुत बटोरी, पर इनका ना कोई मोल
रे मन तू दादी-दादी बोल ।4l
दादी नाम की महिमा न्यारी, जानले इसका मोल,
रे मन तू दादी-दादी बोल
5. मुझको तुझपे बड़ा भरोसा

6. मेरे संग-संग ही रहना

7. जब याद करूँ दादीजी
8. ओ माई रेऐऐ…, मुझको भूल न जाना
9. लेकर थारी चुनरी, आयो थारे द्वार

10. तेरे धाम में पहुंचू तो…
11. मेरी दादीजी ना आई…
12. आ जा रे मैया तेरी याद सताए
नींद ना आए मुझे ??
13. तूने कर दिया मालामाल ??
14. अब तो मुझको दीजिए
15. होके सिंह पे सवार
16. मैंने दिलसे तुझे पुकारा
भक्त कह रहा है कि उसके मन और दिल में केवल दादीजी का नाम बसा है, वह हर समय दादीजी को पुकार रहा है और उनकी प्रतीक्षा करते हुए प्रेम से उनका स्वागत करने को तैयार है।
अपनी इष्ट देवी, कुल देवी, दादी जी के प्रेम में, नाचता एक भक्त,
17. तेरे नाम के घुँघरू बांध के नाचू,नाचू तेरे आंगन में,
तेरे नाम के घुँघरू बांध के नाचू,नाचू तेरे आंगन में,
तेरे प्रेम में होकर मस्त-मस्त, मैं नाचू तेरे आंगन में।
मैं तो देख रहा मन आँखों से, दादी जी संग-संग नाच रही,
तेरे प्रेम की मस्ती छाई ऐसी , दिल झूम रहा मेरा बारी-बारी,।
जब-जब तेरा ध्यान लगाऊँ, लगता है तू मेरे पास खड़ी,
मेरे कदमों के संग-संग, दादी जी भी तो नाच रही। तेरे कदमों की आहट भी सुनी I
मैं तो देख रहा मन आँखों से, दादी जी संग-संग नाच रही,
मीरा बाई को नाचने-गाने से अंदर से अपार खुशी और शांति मिलती थी।
यह खुशी बाहरी नहीं, आत्मा की खुशी थी। उन्हें लगता था कि वे अपने भगवान के साथ जुड़ी हुई हैं।
भक्ति में नृत्य उनके लिए पूजा जैसा था, जैसे कोई ध्यान करता है।
भगवान से जुड़ाव (Divine Connection)
मीरा के लिए श्रीकृष्ण सिर्फ देवता नहीं, प्रियतम और जीवन का आधार थे।
- उसके मन में दादीजी के प्रति गहरा स्नेह है उनके प्रेम में डूबकर नाचते-गाते समय उसे महसूस होता है कि वह अपनी दादीजी के पास है I वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है I प्रेम में डूबकर आनंद और कोमलता का अनुभव I
- भक्त को ऐसा लगता है मानो उसकी कुल देवी दादीजी भी उसकी आँखों के सामने उसके साथ नृत्य कर रही है। वह उन्हें अपनी मन की आँखों से देख रहा हैं I
-
बाहर से आँखें बंद है, लेकिन अंदर से माई के दर्शन हो रहे है।
भक्ति में आनंद और भाव-विभोरता (Ecstatic Joy)
जब भजन गाता है, तो:
- कभी आँसू आ जाते है (आनंद या प्रेम के)
- कभी हृदय अत्यंत प्रसन्न हो जाता है
- कभी वे भाव-विभोर होकर गाने लगते है
इसे ही भक्ति का रस या आनंदानुभूति कहा जाता है।
-
तुलसीदास जी को लगता था कि राम केवल कल्पना नहीं, बल्कि सजीव रूप में उनके साथ हैं।
- वे हर कार्य में भगवान की उपस्थिति महसूस करते थे
- उन्हें विश्वास था कि राम उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं
उनकी प्रसिद्ध पंक्ति है:
“सिया राममय सब जग जानी”
अर्थ — उन्हें हर जगह राम ही दिखाई देते थे।
उन्हें अनुभव होता था कि
“मेरे रक्षक स्वयं भगवान हैं।”
पूरी तरह भगवान को समर्पित हो जाना।
- वे अपने लेखन (जैसे Ramcharitmanas) को भी भगवान की सेवा मानते थे
- सेवा करते समय उन्हें गहरा आनंद और संतोष मिलता था
18. तेरे आंगन में पांव रखूँ जब, जीवन उत्सव सा लगता है,
गाऊँ गीत तेरे झूम-झूम के, मस्ती का मंजर लगता है।
तेरे नाम की महिमा इतनी प्यारी, जितना गाऊँ कम पड़ती है,
तेरी कृपा की एक झलक से, मेरी बिगड़ी बन जाती है।
मेरे दिल से तेरा रिश्ता है, मैं ना भूलू दादीजी,
तेरे प्रेम की ज्योत जली है, मेरे दिल में दादीजी,
तेरे नाम का दीप जलाकर, राह चलूँ मैं दादीजी।
तेरे नाम की धुन सुन-सुन कर, मन मेरा नाचे दादीजी।
मीरा बाई को नाचने से पैसा या पद नहीं मिला,
उन्हें मिला — सच्चा आनंद, भगवान का प्रेम और आत्मिक शांति।
प्रस्तुत भजन एक भक्त के बहुत ही सुंदर भक्ति-भाव, प्रेम, अटूट श्रद्धा और समर्पण से भरा हुआ हैं। इसमें एक भक्त अपनी कुल देवी (दादीजी) के प्रति गहरा लगाव, भावनात्मक जुड़ाव व्यक्त कर रहा है। आइए इसे सरल तरीके से गाए:
19. तुझसे बातें कितनी भी करलूँ ,जी नहीं भरता दादीजी,
बार-बार थारी छबि निहारु, नजर हटे ना दादीजी।
दुख के बादल जब भी घिर आते, आस बनो थे दादीजी,
थारे चरणों में सिर रखूं तो, मन शांत हो जाता दादीजी।
अंधियारे में दीपक बनकर, राह दिखाती दादीजी,
भटके मन को थाम के, सही दिशा बतावे दादीजी।
तेरी कृपा की छांव मिले तो, हर संकट टल जाता,
थारो नाम जपते-जपते, जीवन सफल हो जाता।
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ईश्वर को किसी ने नहीं देखा, लेकिन जब कोई बिगड़ी हुई बात अचानक बन जाती है, तो अंदर से अंतरात्मा की आवाज़ आती है, कि कोई तो शक्ति है, जिसने मेरी बिगड़ी हुई बात बनाई है, जो मेरे साथ है, और वह मेरी दादीजी है, उनकी उपस्थिति हमें महसूस होती है, ठीक वैसे ही जैसे हवाओं को हमने नहीं देखा, लेकिन उनका स्पर्श हमें उनकी मोजुदगी का एहसास दिलाता है I एक भक्त की बिगड़ी हुई बात जब बन जाती है, तो वह कहता है-
यह भजन बहुत भावनात्मक और भक्तिभाव से जुड़ा हुआ है। ऐसी भावना—अपनी कुल देवी राणी सती दादी के प्रति प्रेम (Divine Love) ❤️, समर्पण (Surrender) 🙇♂️ और उनके चरणों में स्थान-शरणागति (Seeking refuge) 🌼 पाने की इच्छा—जिसका अर्थ होता है — पूर्ण समर्पण, शरण और आंतरिक शांति की कामना। 🙏
दादीजी का एक भक्त, झुंझुनू में, दादीजी के मंदिर जाता है, मंदिर में वह दादीजी की मूरत को देख कर उसमें निहित उनकी करुणा को देखकर, उसके मन में प्रेम उमड़ता है। वह चाहता है कि उसे देवी की शरण और संरक्षण दोनों मिले। भक्त विनती करता है कि देवी उसे स्वीकार करें और उसकी प्रार्थना सुनें।
यह भक्त की-
- आध्यात्मिक निकटता का संकेत है
- उसके भक्ति और विश्वास की गहराई दिखाता है
- यह ईश्वर/देवी के प्रति आत्मीय संबंध को दर्शाता है
आईये भजन को सुनते है-
21. तेरी कजरारी आँखों को देखूँ, दादीजी बड़ा सा प्यार उमड़े
तेरे चरणों में बस जाऊँ माई, मेरे मन में, विचार उमड़े
अपने चरणों में मुझको बसा ले, ओ माई, मेरी बात सुन ले।
तेरी कजरारी अंखियों में ममता का सागर झलके,
तेरे नाम का दीप जलाऊँ, भक्ति की ज्योति जगाऊँ, तेरे दर पे शीश झुकाऊँ
तेरी महिमा सबसे में न्यारी, तू ही सबकी पालनहारी,
तेरे बिन ये जीवन सूना, तू ही मेरी सच्ची दुलारी।
जो भी तेरे द्वार पे आए, भर दे तू झोली उसकी प्यारी।
तेरी कृपा का अमृत बरसा दे,
दया द्रष्टि मुझपर भी डालो
मुझसे ना मुहँ फेर
अन्तरा 5:
तेरी ज्योति सदा जगमगाए, अंधियारा सब दूर भगाए,
तेरे नाम की महिमा गाऊँ, मन में विश्वास बढ़ाए।
भक्ति का दीप हृदय में जला दे,
ओ माई, मुझको शक्ति दे दे।
अन्तरा 6:
तेरे चरणों की धूल जो पाए, जीवन उसका सफल हो जाए,
तेरे नाम का सुमिरन करके, हर जन भवसागर तर जाए।
22. तेरे दरबार में दादी
मेरे प्रिय भक्त-जनों…
दादीजी…झुन्झुनुवाली के…
यूट्यूब चैनल पर…
आपका स्वागत है.
दोस्तों यह मात्र एक भजन नहीं है.
यह एक भक्त के मन मे
अपनी दादीजी के प्रति
आत्मविश्वास (confidence) है,
कि वह मेरी है,
मेरे साथ है,
चाहे दुःख हो या सुख
हमेशा मेरे साथ रहेगी,
मेरे लिए बैठी है,
मेरा कोई अहित नहीं होने देगी,
और अगर कुछ हो भी गया तो
वह अपने आप संभाल लेगी.
मुझे चिंता करने की,
घबराने की
कोई जरुरत नहीं है.
भक्त कहता है-
तेरे दरबार में दादी,
ओ…दादी…ओ…
ओ…दादी…रे…
तेरे दरबार में दादी…
मैं अक्सर रोज आता हूं
ओ…दादी…ओ…
ओ…दादी…रे…
मैं अक्सर रोज आता हूं
यहाँ अपना-सा लगता है,
मैं दुनिया भूल जाता हूं
तेरे दरबार में दादी…
न कोई डर यहाँ मुझको,
ओ…दादी…ओ…
ओ…दादी…रे…
न कोई डर यहाँ मुझको,
न कोई फिक्र सताती है,
यहाँ हरवक़्त मैं तुझको,
अपने संग पाता हूं
तेरे दरबार में दादी…
जो विपदा आगई कोई,
ओ…दादी…ओ…
ओ…दादी…रे…
जो विपदा आगई कोई,
हल तू ही सुझाती है
सभी कुछ छोड़ कर तुझ पर
मैं मीठी नींद सोता हूं
तेरे दरबार में दादी…
मुझे खुश करने के खातिर,
ओ…दादी…ओ…
ओ…दादी…रे…
मुझे खुश करने के खातिर,
तू अक्सर हार जाती है
यही ममता तेरी मुझको
यहाँ तक खींच लाती है.
तेरे दरबार में दादी…
अंतरा
न.तेरी चोखट छोड़ूगा
ओ…दादी…ओ…
ओ…दादी…रे…
न.तेरा चोखट छोड़ूगा
अडिग हूं अपने वादे पर
पालूंगा एक.दिन मैं तुझको
बड़ा विश्वास है मन मे
तेरे दरबार में दादी…
हिन्दू धर्म की
एक महत्वपूर्ण मान्यता है,
गरुड़ पुराण कहता है,
मृत्यु के बाद
हमारी आत्मा
गऊमाता की पूंछ पकड़कर
वैतरणी नदी पार कर
मोक्ष को प्राप्त करती है.
भक्त कहता है…
पकड़ कर पल्लू मैं तेरा
ओ…दादी…ओ…
ओ…दादी…रे…
पकड़ कर पल्लू मैं तेरा
वैतरणी पार कर लूगा
बड़ा विश्वास है मन मे
मैं एक दिन तुझको पालूँगा
तेरे दरबार में दादी…
II जय दादी II जय दादी की II
23. यो मनड़ो मान ना…
मेरे प्रिय भक्त-जनों…
दादीजी…झुन्झुनुवाली के…
यूट्यूब चैनल पर…
आपका स्वागत है.
मैं…विमल तुलस्यान दादीजी का…
एक छोटा-सा भक्त हूं…
मेरे मन को न जाने…
क्या हो गया है…
इसे हर वक्त
झुंझुनू जाने की
लगी रहती है…
मैं इसे
बार-बार
समझा कर
थक चुका हूं…
कि भाई रोज-रोज
झुंझुनू जाना
संभव नहीं…
इससे तो हमारा
सारा धंदा-पानी
चोपट हो जायेगा…
लेकिन यह
मेरी बात मानने को
तैयार नहीं…
मैं अपने मन की पीड़ा
आप लोगों के सामने…
दादीजी के कह रहा हूं-
यो मनड़ो मान ना…
यो मनड़ो मान ना…
बार-बार एक जिद है इसकी,
चालो झुंझुनू धाम,
यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,
माई से मिल आ…वा…,
ओ.दर्शन कर आ…वा…
आपणी कह आ…वा…
माई की सुन आ…वा…
यो देव तर्क हजार
ना मा…न मेरी कोई बात
यो मनड़ो मान ना…
चीला-पुड़ा को घोल बनाकर,
निज हाथों से भोग बनाकर,
बोल…चालो झुंझुनू धाम,
यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,
माई को भोग लगा…आवा,
या, जिद इसकी हर बार,
चालो जी, चालो झुंझुनू धाम,
ना मा…न मेरी कोई बात
यो मनड़ो मान ना…
भांति-भांति के फूल बटोरे,
निज हाथों से इन्हें पिरोवे
बोल,चालो झुंझुनू धाम,
यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,
माई न पहना…आवा…
या, जिद इसकी हर बार,
यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,
चालो जी, चालो झुंझुनू धाम,
ना मा…न मेरी कोई बात
यो मनड़ो मा…न ना…
गाढ़ी-रचनी मेहंदी लाकर
निज होथों से घोल बना कर,
बोल, चालो झुंझुनू धाम,
यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,
माई का मांडू दोनों हाथ…
या, जिद इसकी हर बार,
चालो जी, चालो झुंझुनू धाम,
ना मा…न मेरी कोई बात
यो मनड़ो मा…न ना…
सुंदर सी एक चुनरी लाकर,
गोटो, मोती, तार लगाकर,
बोल,चालो झुंझुनू धाम,
यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,
माई को उढा…आवा
या, जिद इसकी हर बार,
चालो जी, चालो झुंझुनू धाम,
ना मा…न मेरी कोई बात
यो मनड़ो मान ना…
बैध बुलाया, हकीम दिखाया,
रोग न कोई पकड़ न पाया,
अब थे ही करो उपचार,
दादीजी थे ही करो उपचार,
ना मा…न मेरी कोई बात
यो मनड़ो मान ना…
बार-बार एक तुझको पुकारे,
लेकर तेरा नाम,
यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,
चालो जी, चालो झुंझुनू धाम,
ना.मा.न मेरी कोई बात
यो मनड़ो ना मान…
24. मेरा जी नहीं लगता
मेरे प्रिय भक्त-जनों…
दादीजी…झुन्झुनुवाली के…
यूट्यूब चैनल पर…
आपका स्वागत है.
एक बहुत ही सुंदर भजन है,
जिसमे एक भक्त
नाना-प्रकार के
यत्न करता है,
ताकि किसी तरह
दादीजी से
उसका मिलन हो जाए.
वह उनके सामने
कई प्रकार के
विकल्प रखता है
ताकि माई कि
उसपर कृपा हो जाए.
आइये,
सुनते है भजन को,
कि भक्त के मन मे
क्या चल रहा है-
मेरा जी नहीं लगता दादीजी,
तुझसे मिलने मैं आऊ
मेरा जी नहीं लगता दादीजी,
तुझसे मिलने मैं आऊ
जब से होश संभाला मैंने,
तुझको अपना माना,
और न कोई दूजा मेरा,
बस तुझको ही जाना
जब से लागी लगन जिया में,
ओ लागी रे…ओ माई ओ
जब से लागी लगन जिया में,
दूर नही रह पाऊ
मन मिलने को व्याकुल मेरा,
कैसे चैन मैं पाऊ.
ओ माई रे…ओ माई ओ
कैसे चैन मैं पाऊ.
अंखियाँ मेरी भर-भर आव
चैन कहाँ से लाऊँ
ओ माई तुझसे मिलने मैं आऊ…
भक्त कहता है-
मैं फूल बनजाऊ,
तेरी माला मे गूँथ जाऊ,
मैं फूल बनजाऊ रे,
तेरी माला मे गूँथ जाऊ,
जब मुझ पे नज़र पड़ेगी,
मेरी याद तुझे आयेगी.
जब याद मेरी आयेगी,
तू दोड़ी चली आयेगी
मैं यही तो चाहता दादीजी
तुझसे मिल चैन मैं पाऊ.
मेरा जी नहीं लगता दादीजी,
तुझसे मिलने मैं आऊ…
मैं मेहंदी बनजाऊ,
तेरे हाथों में रच जाऊ,
मैं मेहंदी बनजाऊ रे,
तेरे हाथों में रच जाऊ,
जब-जब मेहंदी महकेगी ,
मेरी याद तुझे आयेगी.
जब याद मेरी आयेगी,
तू दोड़ी चली आयेगी
मैं यही तो चाहता दादीजी,
तुझसे मिल चैन मैं पाऊ.
मेरा जी नहीं लगता दादीजी,
तुझसे मिलने मैं आऊ…
मैं बिंदिया बनजाऊ,
तेरे माथे पे सज जाऊ,
मैं बिंदिया बनजाऊ रे,
तेरे माथे पे सज जाऊ,
मैं काजल बन जाऊ,
तेरी आँखों मे बस जाऊ
मैं काजल बन जाऊ रे,
तेरी आँखों मे बस जाऊ
जब-जब दर्पण देखोगी,
मेरी याद तुझे आयेगी.
जब याद मेरी आयेगी,
तू दोड़ी चली आयेगी
मैं यही तो चाहता दादीजी
तुझसे मिल चैन मैं पाऊ.
मेरा जी नहीं लगता दादीजी,
तुझसे मिलने मैं आऊ…
मैं पायल बनजाऊ,
तेरे पावों से बंध जाऊ,
मैं पायल बनजाऊ रे,
तेरे पावों से बंध जाऊ,
जब-जब पायल बा…जेगी,
मेरी याद तुझे आयेगी.
जब याद मेरी आयेगी,
तू दोड़ी चली आयेगी
मैं यही तो चाहता दादीजी
तुझसे मिल चैन मैं पाऊ.
मेरा जी नहीं लगता दादीजी,
तुझसे मिलने मैं आऊ…
भक्त कहता है,
जब मेरी माँ को,
कोई जरुरी काम
करना होता था,
तो वे अपने पल्लू से
एक गांठ बांध लेती थी,
यह गांठ उनको
उस जरुरी काम को
करने की याद
दिलाती रहती थी.
भक्त भी
दादीजी से कहता है,
हे माई,
मैं भी तेरे पल्लू की
गांठ बन जाऊ,
ताकि तुझे याद रहे
कि तेरा एक भक्त
तुझे याद करता है.
तुझसे मिलना चाहता है.
भक्त कहता है-
मैं गांठ बनूँ तेरे पल्लू की
तेरे पल्लू से बंध जाऊ,
तेरे पल्लू से बंध जाऊ,
जब पल्लू पर नज़र पड़ेगी,
मेरी याद तुझे आयेगी.
जब याद मेरी आयेगी,
तू दोड़ी चली आयेगी
मैं यही तो चाहता दादीजी
तुझसे मिल चैन मैं पाऊ.
मेरा जी नहीं लगता दादीजी,
तुझसे मिलने मैं आऊ…
हिन्दू धर्म की
एक महत्वपूर्ण मान्यता है,
गरुड़ पुराण कहता है,
मृत्यु के बाद
वैतरणी नदी पार कर
मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है.
भक्त कहता है…
पल्लू पकड़ के एक दिन तेरा
वैतरणी पार कर लूँगा
विश्वास घना है मन के मा…ई
एक दिन तुझको पालूँगा
25. तेरा बुलावा आता रहे माँ
मेरे प्रिय भक्त-जनों…
दादीजी…झुन्झुनुवाली के…
यूट्यूब चैनल पर…
आपका स्वागत है.
दादीजी जी का
एक भक्त है,
वह कहता है,
हे माई,
मानाकि तेरे भक्त अनेकों है,
और वें तेरा
पूरा-पूरा ख्याल रखते हैं.
लेकिन तेरी सुध-बुध लेना
मेरी दिनचर्या बन गई है.
जबतक मैं अपनी आखों से
तुझे देख न लू,
मुझे चैन नहीं पड़ता,
मुझे नींद नहीं आती.
भक्त चाहता कि
कभी कीर्तन के बहाने,
कभी तेरे मंगल पाठ के बहाने
या फिर किसी और बहाने से
तेरे दरबार मे आने का
मौका मिलता रहे
और मैं अपनी आखों से
तुझे देख सकू,
सब-कुछ देख सकू
तेरे हाल-चाल जान सकू.
भक्त कहता है-
तेरा बुलावा आता रहे माँ,
कुछ तो ऐसा होता रहे,
तेरा बुलावा आता रहे माँ,
कुछ तो ऐसा होता रहे,
हाल तेरा क्या, जानसकू मैं,
दिल में तसल्ली होती रहे.
तेरा बुलावा आता रहे माँ,
जैसे एक संसकारी पुत्र
रातको… अपने काम-धंदे
से घर लोटकर…
स्वयं खाना खाने से पहले
अपनी पत्नी से पुछता है…
कि मम्मी-पापा ने…
खाना खाया कि नहीं…
ठीक इसी तरह…
भक्त को भी…
इस बात की चिंता
रहती है…
कि कहीं उसकी माई,
उसकी दादीजी,
भूखी-प्यासी तो नहीं …
वह कहता है…
भूखी-प्यासी तो नहीं बैठी,
भोग तुझे नित लगता रहे,
देखलूँ अपनी आखों से तो,
दिल में तसल्ली होती रहे.
हाथों मे मडी मेहंदी
और उसकी मनमोहक महक
दादीजी का मन मोह लेती हैI
भक्त भी चाहता है कि
उसकी दादीजी के हाथों में
हमेशा मेहंदी मडी रहे I
भक्त कहता है-
बिन मेहंदी के तो नहीं बैठी,
तेरे हाथों में मेहंदी रचती रहे
देखलू अपनी आखों से तो,
दिल में तसल्ली होती रहे.
दादीजी को मस्त-मस्त फूलों का गजरा
बहुत पसंद है, वह कहता है…
बिन गजरे के तो नहीं बैठी,
गजरे में तू सजती रहे
देखलू अपनी आखों से तो,
दिल में तसल्ली होती रहे.
दादीजी को लाल-चुनरिया
बहुत पसंद है, वह कहता है…
लाल चुनरिया गोटे वाली,
हर पल तेरे सर पे रहे,
देखलू अपनी आखों से तो,
दिल में तसल्ली होती रहे.
इसीलिए, भक्त कहता है…
तेरा बुलावा आता रहे माँ,
कुछ तो ऐसा होता रहे,
हाल तेरा क्या, जानसकू मैं,
दिल में तसल्ली होती रहे.
तेरा बुलावा आता रहे माँ,
26. छोड़दी सारी दुनिया
मेरे प्रिय भक्त-जनों…
दादीजी…झुन्झुनुवाली के…
यूट्यूब चैनल पर…
आपका स्वागत है:
छोड़दी सारी दुनिया तेरे लिए,
अबतो आओ दादीजी मेरे लिए…2
जिंदगी का तो कोई भरोषा नहीं,
मेरी जिंदगी है तेरे लिए,
छोड़दी सारी दुनिया तेरे ही लिए…
मन का मन से मिलन तो हुआ है मगर,
तुझे आखों से अबतक तो देखा नहीं…2
तेरे गजरे की खुशबू तो आती है मगर,
तुझे गजरे में अबतक तो देखा नहीं…2
तेरी मेहंदी की खुशबू तो आती है मगर,
तेरे हाथों मे मेहंदी तो देखी नहीं…2
मानाकि मैं तेरे लायक नहीं,
(भक्त कहता है,
बहुत दोष है मुझमें,
सांसारिक पुरुष हूं,
जीवनयापन के लिए
अनेकों झूठ-सांच करता हूं,
लेकिन फिर भी…)
हूं भक्त तो तेरा ही, ये झू…ठ नहीं
मानाकि मैं तेरे लायक नहीं,
हूं भक्त तो तेरा ही, ये झूठ नहीं,
प्यासी है अखियाँ, बुलाती तुझे,
यूं इनको रुलाना तो ठीक नहीं…2
मेरी उम्र यूंही ना बीते कभी,
तेरा यूं ना आना तो ठीक नहीं…2
एकबार तो देखू जी भर के तुझे,
इतना सा मैं मांगू, बेजा तो नहीं
(भक्त कहता है,
धन-दोलत तो तुझसे मांगा ही नहीं,
बस इतना सा मांगा,
एकबार तुझसे मिलना हो जाये,
चाहे तू आजा या फिर मुझको बुलाले)
छोड़दी सारी दुनिया तेरे ही लिए…
27. जब हो जाये असहाय
मेरे प्रिय भक्त-जनों…
दादीजी…झुन्झुनुवाली के…
यूट्यूब चैनल पर…
आपका स्वागत है:
जब हो जाये असहाय,
बिगड़ जाए तेरी कोई बात,
तेरा कोई … ना देवे साथ,
तेरी कोई … ना सुने पुकार,
झुंझुनू हो आना…
झुंझुनू हो आना,
दादीजी देगी तेरा साथ,
बनेगी तेरी बिगड़ी बात,
एकबार आजमाना,
झुंझुनू हो आना…
झुंझुनू हो आना,
जब बन जाये तेरी बात,
संवर जाये तेरी बिगड़ी बात,
दिल में जब होजाये विश्वास,
झुंझुनू हो आना…
झुंझुनू हो आना,
दादीजी से रुबरु मिलकरके
शुक्रिया कह आना,
शुक्रिया कह आना,
झुंझुनू हो आना…
झुंझुनू हो आना,
28. मैं तो तुझसे थोड़ा सा मांगू , तू झोली भर देती है,
कैसे चुकाऊ कर्ज मैं तेरा, तू तो बड़ी दरियादिल है I
जीवन की राहों में जब भी , थक कर बैठा दादीजी,
टूटे दिल को तूने थामा, संकटमोचक बन मेरी II
29. लेलो… मुझको भी शरण में मेरी माई, मैं कब से तेरे द्वार खड्यों,
मोह-माया के जाल में फंस कर, भूल गया था तुझको,
चैत हुआ तो ले डूबी थी, सारी उमरिया मुझको,
भूल-चूक अब माफ भी करदो, लेलो शरण में मुझको
धन-दौलत कुछ ना मांगूं मैं, साथ नहीं कुछ जाये,
मैं तो बस इतना-सा मांगूं , मेरे दिल में तू बस जाये
30. जैसे ही दादी तेरे द्वार पे पहुंचा, देखा एक नजारा,
बदली हार, जीत में मेरी, मिल गया तेरा सहारा I
ओ दादी, मिल गया तेरा सहारा
हाथ पकड़ कर दादी बोली, अब कैसा है, तू बेटे
आँखों में भर आया पानी, मुख से बोल ना फूटे
31. बार-बार दिल कहे दादीजी, ना करना इंकार,
आजाओ दादीजी, आजा…ओ मेरे द्वार,
आँसू झलके, बार-बार तुझे याद करे माँ,—(2)
नाम तेरा ले-लेके बोले…
आजाओ दादीजी, आजा…ओ मेरे द्वार,
दिल में ऐसी अगन लगी है, बुझा न पाऊँ
जब तक तुझसे न मिल पाऊँ, चैन न पाऊँ,
दुनिया सारी फीकी लाग्
मन घबरावे
द्वार खरयों थारो भक्त दादी, तुझे पुकारे
नाम तेरा ले-लेके बोले…
आजाओ दादीजी, आजा…ओ मेरे द्वार,
32. मेरे साथ वो बैठी है, मेरे दिल की सुनती है,
विपदा में अगर होऊ, मेरा हाथ पकडती है,
उसको मैं ना भूलू, मेरी बिगड़ी बनाती है,
33. म्हान हिवड़ स लगाले म्हारी माय, मैं आयो थारे द्वार खड्यों…2
रात-रात भर नींद न आवे, सुमरू थारो नाम,
तड़प-तड़प कर प्रेम में थार, हो गयो मैं बेहाल
दिल भी ख़ाली-ख़ाली सो, लाग् म्हारी माय, मैं आयो थार द्वार खड्यों
म्हान आँचल स लगाले म्हारी माय, मैं आयो थार द्वार खड्यों
मन में भाव भरयों है म्हारे, तुझसे मिलना हो जाये,
एक बार भी मिल लू तुझसे, मन हल्का हो जाये
म्हान आँचल स लगाले म्हारी माय, मैं आयो थार द्वार खड्यों
34. मेरे संग-संग ही रहना, मुझसे दूर नहीं जाना
ह अर्ज मेरी है दादीजी, इसको ना झुठलाना I
35. तेरी ध्वजा उड़े आसमान बहुत ही अच्छा लगता है
इसे देख-देख दादीजी मन मेरा हर्षित होता है I














