भक्त द्वारका

अपनी इष्ट देवी, कुल देवी, दादी जी के प्रेम में, नाचता एक भक्त,

तेरे नाम के घुँघरू बांध के नाचू, नाचू तेरे आंगन में, तेरे प्रेम में मस्त-मस्त, मैं नाचू तेरे आंगन में।

तेरे दर पे जो भी आता, खाली कोई नहीं जाता, तेरी कृपा की छाया में, उसका हर एक दुःख मिट जाता।

मैं तो देख रहा मन आँखों से, दादी जी संग मेरे नाच रही,
तेरे प्रेम की ऐसी मस्ती छाई, हर सांस में तू ही बस रही।

तेरी कृपा की छाया में, दिल मेरा झूमे बार-बार,
तेरे नाम के घुँघरू बाँध के, करूँ मैं तेरा गुणगान अपार।

जब-जब मन तेरा ध्यान लगाए, लगता तू पास खड़ी,
मेरे हर कदम के संग-संग, दादी जी तू साथ चली।

मैं तो देख रहा मन आँखों से, दादी जी संग मेरे नाच रही,
भक्ति के इस मधुर आनंद में, मेरी आत्मा मुस्का रही।

“मैं तो बस कृष्ण के चरणों की धूल बन जाऊँ।”

अगर मैं मनुष्य बनूँ, तो गोकुल के ग्वालों के बीच रहना चाहूँ।

आत्मिक आनंद (Inner Bliss) 😊

मीरा बाई को नाचने-गाने से अंदर से अपार खुशी और शांति मिलती थी।

यह खुशी बाहरी नहीं, आत्मा की खुशी थी।

  • उन्हें लगता था कि वे अपने भगवान के साथ जुड़ी हुई हैं।

भक्ति में नृत्य उनके लिए पूजा जैसा था, जैसे कोई ध्यान करता है।


2️⃣ भगवान से जुड़ाव (Divine Connection) 🪔

मीरा के लिए श्रीकृष्ण सिर्फ देवता नहीं, प्रियतम और जीवन का आधार थे।

  • उसके मन में दादीजी के प्रति गहरा स्नेह है उनके प्रेम में डूबकर नाचते-गाते समय उसे महसूस होता है कि वह अपनी दादीजी के पास है I वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है I प्रेम में डूबकर आनंद और कोमलता का अनुभव I
  • भक्त को ऐसा लगता है मानो उसकी कुल देवी दादीजी भी उसकी आँखों के सामने उसके साथ नृत्य कर रही है। वह उन्हें अपनी मन की आँखों से देख रहा हैं I 
  • बाहर से आँखें बंद है, लेकिन अंदर से माई के दर्शन हो रहे है।

    भक्ति में आनंद और भाव-विभोरता (Ecstatic Joy) 🎶

    जब  भजन गाता है, तो:

    • कभी आँसू आ जाते है (आनंद या प्रेम के)
    • कभी हृदय अत्यंत प्रसन्न हो जाता है
    • कभी वे भाव-विभोर होकर गाने लगते है

    इसे ही भक्ति का रस या आनंदानुभूति कहा जाता है।

  • तुलसीदास जी को लगता था कि राम केवल कल्पना नहीं, बल्कि सजीव रूप में उनके साथ हैं।

    • वे हर कार्य में भगवान की उपस्थिति महसूस करते थे
    • उन्हें विश्वास था कि राम उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं

    उनकी प्रसिद्ध पंक्ति है:
    “सिया राममय सब जग जानी”
    अर्थ — उन्हें हर जगह राम ही दिखाई देते थे।


    उन्हें अनुभव होता था कि
    “मेरे रक्षक स्वयं भगवान हैं।”


    पूरी तरह भगवान को समर्पित हो जाना।

    • वे अपने लेखन (जैसे Ramcharitmanas) को भी भगवान की सेवा मानते थे
    • सेवा करते समय उन्हें गहरा आनंद और संतोष मिलता था

    4️⃣

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तेरे आंगन में पांव रखूँ जब, जीवन उत्सव सा लगता है,
गुण गाऊँ तेरे झूम-झूम के, मस्ती का मंजर लगता है।

तेरे नाम की महिमा इतनी है, जितना गाऊँ कम पड़ता है,
तेरी कृपा की एक झलक से, संकट सब मिट जाता है।

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मेरे दिल से तेरा रिश्ता है, मैं ना भूलू दादीजी,

तेरे प्रेम की ज्योत जली है, मेरे दिल में दादीजी,

तेरे नाम का दीप जलाकर, राह चलूँ मैं दादीजी।

तेरे नाम की धुन सुन-सुन कर, मन मेरा नाचे दादीजी।

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मीरा बाई को नाचने से पैसा या पद नहीं मिला,

मीरा बाई को नाचने से पैसा या पद नहीं मिला,
उन्हें मिला — सच्चा आनंद, भगवान का प्रेम और आत्मिक शांति।

प्रस्तुत भजन एक भक्त के बहुत ही सुंदर भक्ति-भाव, प्रेम, अटूट श्रद्धा और समर्पण से भरा हुआ हैं। इसमें एक भक्त अपनी कुल देवी (दादीजी) के प्रति गहरा लगाव, भावनात्मक जुड़ाव व्यक्त कर रहा है। आइए इसे सरल तरीके से गाए। 🌼🙏

तुझसे बातें करते-करते, जी नहीं भरता दादीजी,
बार-बार थारी छबि निहारु, नजर हटे ना दादीजी।

दुख के बादल जब भी घिरते, तू ही आस बन जाती,
थारे चरणों में सिर रखूं, मन को शांति मिल जाती।

अंधियारे में दीप बनकर, राह दिखावे दादीजी,
भटके मन को थाम के, सही दिशा बतावे दादीजी।

तेरी कृपा की छांव मिले तो, हर संकट टल जाता,
थारो नाम जपते-जपते, जीवन सफल हो जाता।


ईश्वर को किसी ने नहीं देखा, लेकिन जब कोई बिगड़ी हुई बात अचानक बन जाती है, तो अंदर से अंतरात्मा की आवाज़ आती है, कि कोई तो शक्ति है, जिसने मेरी बिगड़ी हुई बात बनाई है, जो मेरे साथ है, और वह मेरी दादीजी है, उनकी उपस्थिति हमें महसूस होती है, ठीक वैसे ही जैसे हवाओं को हमने नहीं देखा, लेकिन उनका स्पर्श हमें उनकी मोजुदगी का एहसास दिलाता है I एक भक्त की बिगड़ी हुई बात जब बन जाती है, तो वह कहता है-

आज फिर दिल ने, दादीजी, तुझे याद किया है,

मेरी बिगड़ी…

मेरी बिगड़ी जो बन गई तो, तुझे याद किया है

आज फिर दिल ने, दादीजी, तुझे याद किया है,

 

आँखों से तो देखा नहीं, महसूस किया है

मेरी बिगड़ी जो बन गई तो, महसूस किया है

आज फिर दिल ने, दादीजी, तुझे याद किया है,

 

मन की दो बातें करू तुझसे, मन में आया है I

मैंने सांसों में तेरा ना…म बसाया है

तेरे आँगन में बैठू तो, सुकून मिलता है

तेरा आँचल है, मेरे सिर पर, मुझे लगता है

आज फिर दिल ने, दादीजी, तुझे याद किया है,

 

 

 

 

यह भजन बहुत भावनात्मक और भक्तिभाव से जुड़ा हुआ है। ऐसी भावना—अपनी कुल देवी राणी सती दादी के प्रति प्रेम (Divine Love) ❤️, समर्पण (Surrender) 🙇‍♂️ और उनके चरणों में स्थान-शरणागति (Seeking refuge) 🌼 पाने की इच्छा—जिसका अर्थ होता है — पूर्ण समर्पण, शरण और आंतरिक शांति की कामना। 🙏

राणी सती दादीजी का एक भक्त, झुंझुनू में, दादीजी के मंदिर जाता है, मंदिर में वह दादीजी की सुंदरता और उनकी करुणा देखकर, उसके मन में प्रेम उमड़ता है। वह चाहता है कि उसे देवी की शरण और संरक्षण दोनों मिले। भक्त विनती करता है कि देवी उसे स्वीकार करें और उसकी प्रार्थना सुनें।

यह भक्त की-

  • आध्यात्मिक निकटता का संकेत है
  • उसके भक्ति और विश्वास की गहराई दिखाता है
  • यह ईश्वर/देवी के प्रति आत्मीय संबंध को दर्शाता है

आईये भजन को सुनते है-

तेरी कजरारी आँखों को देखूँ, दादीजी बड़ा प्यार उमड़े
तेरे चरणों में बस जाऊँ माई, मेरे मन में, विचार उमड़े

अपने चरणों में मुझको बसा ले, ओ माई, मेरी बात सुन ले। 🙏

तेरी कजरारी अंखियों में ममता का सागर झलके,

तेरे नाम का दीप जलाऊँ, भक्ति की ज्योति जगाऊँ, तेरे दर पे शीश झुकाऊँ

तेरी महिमा सबसे में न्यारी, तू ही सबकी पालनहारी,
तेरे बिन ये जीवन सूना, तू ही मेरी सच्ची दुलारी।


जो भी तेरे द्वार पे आए, भर दे तू झोली उसकी प्यारी।
तेरी कृपा का अमृत बरसा दे,
दया द्रष्टि मुझपर भी डालो

मुझसे ना मुहँ फेर

 


अन्तरा 5:
तेरी ज्योति सदा जगमगाए, अंधियारा सब दूर भगाए,
तेरे नाम की महिमा गाऊँ, मन में विश्वास बढ़ाए।
भक्ति का दीप हृदय में जला दे,
ओ माई, मुझको शक्ति दे दे। 🔥

 


अन्तरा 6:

तेरे चरणों की धूल जो पाए, जीवन उसका सफल हो जाए,
तेरे नाम का सुमिरन करके, हर जन भवसागर तर जाए।

भक्त द्वारका

बहुत पुरानी बात है,

तब आज का झुंझुनू शहर

एक छोटा-सा शहर

हुआ करता था I

उसमें

दादीजी का

एक परम भक्त रहता था,

नाम था द्वारका I

लोग स्नेह-वश उनको

द्वारकाजी कह कर बुलाते थे I

द्वारकाजी

रोज सुबह उठ कर,

दैनिक कार्यों से निपट कर,

दादीजी के मंदिर जाते थे,

और उनकी

पूरी निष्ठा से

पूजा-अर्चना

किया करते थे I

धीरे-धीरे

वक्त गुजरा,

द्वारकाजी बुढे हो गये I

एक दिन

वे

बहुत अधिक

बीमार पड़ गये,

उनके लिये

बिस्तर से उठना भी

मुश्किल हो गया था I

फिर भी

वे

जिद पकड़ कर बैठ गये,

कि उन्हें तो

दादीजी से मिलने

उनके मंदिर जाना है I

उनकी पत्नी ने

उनको

बहुत समझाया,

कि एक दिन नहीं जाओगे

तो कोई

आसमान नहीं टूट पड़ेगा,

लेकिन वे

अपनी जिद पर अड़े रहे I

तब

उनकी पत्नी ने ताना मारा,

कि

“तबियत आप की ख़राब है

आपकी दादीजी की नहीं,

आप नहीं जा सकते

तो क्या हुआ

वह तो आ सकती है

आपसे मिलने I”

द्वारकाजी ने

कोई जबाब नहीं दिया

लेकिन

पत्नी की बात

उनके के दिल मे

बैठ गई.

उस दिन

वे गिरते-पड़ते

किसी तरह

दादीजी के मंदिर पहुँचे

लेकिन

तभी से

उनकी दिनचर्या मे

एक नया मोड़ आया

अब वे नियम से

दादीजी के मंदिर जाकर

उनकी चोखट पर माथा टेककर,

कहने लगे,

“हे माई,

मैं रोज तेरे मंदिर आता हूं I

एक रोज

तू भी तो मेरे घर आजा I

मेरी पत्नी को भी लगे

कि तुम भी

मुझसे मिलने के लिए

उतनी ही बैचेन रहती हो

जितना मैं I”

द्वारकाजी ने

अपना नियम

कभी नही तोड़ा I

चाहे हारी हो

या बीमारी,

आंधी हो

या तूफान,

वे रोज नियम से

मंदिर जाते I

और दादी जी को

अपने घर आने का

न्योता दे आते I

एक दिन

दादी जी ने

उनकी सुन ली

वह अपने भक्त पर

मेहरबान हो गई I

उस दिन

एक ख़ास घटना घटी

पूजा-पाठ के बाद

मंदिर मे ही

उनकी

आँख लग गई

उनको

एक सपना आया

सपने मे उन्होंने देखा

दादीजी उनसे

कह रही है

“सुन द्वारका,

अगली अमावस की रात को

मैं तेरे घर आऊगी I

और रात का भोजन भी

तेरे साथ करूंगी I”

द्वारकाजी की ख़ुशी का

कोई ठिकाना न रहा I

वर्षों बाद

उनके मन की मुराद

पूरी होने जा रही थी I

घर आकर

उन्होंने ने यह बात

अपनी पत्नी को बताई

पत्नी ने दूसरे को,

दूसरे ने तीसरे को,

और देखते-ही-देखते

जंगल की आग की तरह

यह बात

पूरे शहर में

फ़ैल गई I

द्वारकाजी

दादीजी के

पुराने भक्त थे I

रोज नियम से

उनके मंदिर जाते थे I

लोग उनकी बातों पर

विश्वास किया करते थे I

इस बात को भी उन्होंने

गंभीरता से लिया I

और वें

आने वाली

अमावस की रात का

बेसब्री से

इंतजार करने लगें I

अमावस की रात आई

द्वारकाजी ने

अपनी पूरी ताकत से

बहुत बढ़िया

इंतजाम किये I

बहुत सुंदर दरबार सजाया I

सुंदर-सी चाँदी की चौकी बनवाई

अच्छे-अच्छे पकवान बनवायें

और

दादीजी के आने का

इंतजार करने लगे I

धीरे-धीरे लोग

जमा होने लगे

उन्हें

दरबार की साज-सज्जा,

भक्त की तैयारी

और उसका उत्साह

देखकर

अच्छा

लग रहा था I

पूरे के पूरे शहर में

एक उत्सव का सा माहौल

बन गया था I

कुछ लोग कहने लगे,

“वाह द्वारकाजी,

दरबार तो

बहुत सुंदर सजाया I”

“मैंने जयपुर से

खास दरबार सजाने वाले

बुलायें हैं”-

द्वारकाजी ने

उनको

बड़े गर्व से

बताया I

“चाँदी की चोकी

तो

बहुत सुंदर बनवाई” –

दूसरे कुछ लोग

कह रहे थे I

“चाँदी की चोकी

मैंने दिल्ली के खास

सर्राफा बाज़ार से बनवाई है I”

द्वारकाजी ने

उनको भी

खुश बहुत होकर बताया I

“पकवानों की खुशबू तो

बड़ी जबरदस्त आ रही है I”

कुछ दूसरे लोग

कह रहे थे I

“मैंने कलकत्ता से

खास

छप्पनभोग बनाने वाले

हलवाई बुलाये है I”

द्वारकाजी ने

उन्हें भी

बड़े गर्व से बताया I

धीरे-धीरे लोग आते रहे,

कुछ-न-कुछ कहते रहे I

द्वारकाजी फूलकर

कुप्पा होते रहे I

चारों ओर

उनकी वाह-वाही के डंके

चारों ओर बजते रहे I

वे लोगों की बातें

सुन-सुन कर

खुश होते रहे I

आज जमीन पर उनके

पाँव नहीं पड़ रहे थे I

इतनी ख़ुशी

शायद ही उनको

अपने जीवन में

इससे पहले

कभी हुई हो I

वे पूरी तरह

अपने अहंकार मे चूर थे I

उनको तो

होश तब आया

जब

धीरे-धीरे

रात बीतने लगी

लेकिन दादीजी का

कोई अत्ता-पत्ता नहीं था I

लोग

पंडाल के प्रवेश द्वार पर

टकटकी लगाये

दादीजी के आने का

इंतजार करते रहे,

हर कोई

द्वारकाजी से

पूछ रहा था,

“थारी दादीजी

कब आयेगी?

अब तक

आई क्यों नहीं ?

कुछ तो पूछ रहे थे,

द्वारकाजी,

थारी दादीजी

आयेगी भी

या नहीं ?”

द्वारकाजी की सारी ख़ुसिया

धीरे-धीरे

धराशायी होने लगी I

उनका मन बेहद

बेचैन होने लगा I

वे सभी से

कह रहे थे,

“बस अभी

आती ही होगी I

थोड़ा सा

इंतजार करो I”

इंतजार की घड़ियाँ

ख़त्म होने का

नाम ही नहीं

ले रही थी

आधी रात होने को आई

लेकिन दादीजी नहीं आई I

अब लोग निराश हो-होकर

अपने-अपने घरों को

लोटने लगे I

लेकिन जाते-जाते,

जो लोग पहले

द्वारकाजी की

प्रसंसा के पुल बांध रहे थे I

वे अब कह रहे थे,

“द्वारकाजी,

थारी दादीजी

कहाँ रह गई,

अब तक

आई क्यों नहीं ?”

कुछ तो कहने लगे,

“हमें तो पहले ही पता था,

कि किसी ने नहीं आना I

सब ढोंग है,

दिखावा है I”

लोगों की बातें

द्वारकाजी के दिल मे

तीर-सी चुभ रही थी

उनकी हालत

मौत से भी बद्वतर थी I

उनका दिल

रो रहा था I

उनके जी में आ-रहा था

कि धरती फट जाए

और वह उसमे

समा जाए I

वे बेबस,

बेउत्तर,

नजरें झुकाये

सभी की बातें

सुन रहे थे I

और

हाथ जोड़-जोड़ कर

सब को

विदा कर रहे थे I

आंखों में

मोटे-मोटे आँसू लिए,

वे समझ नहीं पा रहे थे

कि आखिर करे

तो क्या करे I

थक-हार कर द्वारकाजी

दादीजी को

उनका वादा

याद दिलाने लगे-

“मावस की है रात दादी…2

आज थान आणों थो,

मावस की है रात I

मावस की है, रात दादी,

आज थान आणों थो,

थान वा…दो निभानो थो,

मावस की है रात I

दरबार दादीजी,

ऐसो सजो थारो,

कि बस गयो आँखों में I

चाँदी की चोकी पे,

आसन सजो थारो,

थे क्यों नहीं

ग्रहण करयो I

जो कुछ बण्यो मुझसे,

अर्पण करयो तुझको,

थे क्यों नहीं

स्वीकार करयो I

पूरी थी तैयारी,

थारा भक्त था सारा,

थे क्यों नही

दर्श दियो I

द्वारकाजी दादीजी से पूछते है

हे माई

क्या भूल हुई मुझसे,

हूं भक्त तो थारो,

थे क्यों नहीं

माफ़ करयो I

द्वारकाजी

बहुत बैचेन हो गये

वे दादीजी से कहते है,

“हे माई,

मैंने अपनी

पूरी सामर्थ्य से

सब-कुछ किया है I

फिर भी

यदि कोई कमी रह गई है

तो मुझे बता,

मैं वह भी

पूरी कर दूँगा I

बस एकबार तू आकर

अपने भक्तों के बीच

मेरी बात रख ले I

मेरी ही नहीं,

तेरी भी

चोरों ओर

जग-हँसाई हो रही है I

द्वारकाजी कहते है

हे माई

मुझे चाहे कोई

कुछ भी कहे

मुझे

कोई फर्क नहीं पड़ता

लेकिन जब कोई

तेरे बारे में

गलत कहता है

तो वह मुझे

बर्दास्त नहीं I”

धीरे-धीरे पंडाल

ख़ाली हो गया

लोग

अपने-अपने घरों को लोट गए I

अमावस की काली रात थी I

चारों ओर

घोर अँधेरा

और

सन्नाटा पसरा था I

सन्नाटे को चीरती हुई,

सांय-सांय करती हुई

हवाएं भी

द्वारकाजी को

अपने उपर

कटाछ कसती

नज़र आ रही थी I

मानो पूछ रही हो,

“क्या हुआ द्वारकाजी,

थारी दादीजी

कहां रह गई ?

अब तक

आई क्यों नहीं ? “

अपमान और तिरस्कार से घायल,

भूखे-प्यासे द्वारकाजी

निढाल होकर

वही पंडाल में बैठ गये

पत्नी के लाख समझाने पर भी

अन्न का  एक दाना भी

अपने मुंह से नहीं लगाया I

दुखी मन से

वे

आत्म-मंथन करने लगे

कि आखिर क्यों?

दादीजी मेरे घर

क्यों नहीं आई?

उन्होंने तो खुद

मुझसे कहा था

कि अगली अमावस की रात को,

वे मेरे घर आयेगी I

और मेरे साथ

रात का भोजन भी करेगी I

मुझसे

ऐसी कौनसी भूल होगई

जिसकी इतनी बड़ी सजा

मुझे

मिली है?

सारा का सारा शहर मुझे

झूठा कह रहा है,

कुछ लोग तो मुझे

पाखंडी और ढोंगी कह रहे हैI

उनकी अंतरात्मा

उन्हें कचोटने लगी,

धिक्कारने लगी

कि क्यों उन्होंने

सारे शहर मे

बात फैलाई I

बेहद दुखी मन से

वे दादीजी से कहते है-

” जब से होश संभाला मैंने,

तेरी चोखट पाई है,

तू ही पालनहारी मेरी,

तू ही तारिणीहारी है I

छोड़ के चलदी

अब क्यों मुझको,

जाऊ कहा बताती जा,

दोष मेरा क्या,

समझ न पाऊ,

इतना तो

समझाती जा II”

बेहद निराश द्वारकाजी को

अपने सवालों के

जवाब नहीं मिलें

उनका मन

बहुत बेचैन हो गया I

वे दादीजी से कहते है-

“जीवनभर का साथ था…

जीवनभर का साथ था

तुम्हारा-हमारा,

तुम्हा…रा हमारा I

वा…दा कर के माई,

क्यों तुमने किया किनारा

जीवनभर का साथ था,

तुम्हारा-हमारा,

तुम्हा…रा हमारा I

जीवनभर के बंधन,

यादों की दीवारें

तोड़ के इनको  कैसे,

चैन से हम जी पाए

सोच-सोच के

तडप रहा है,

मन तो आज हमारा

जीवनभर का साथ था,

तुम्हारा-हमारा,

तुम्हा…रा हमारा II

अब तक

आधी रात

बीत चुकी थी I

चारों ओर

सन्नाटा पसर चुका था I

लेकिन

द्वारकाजी के दिल में तो

उथल-पुथल मची थी

उनको

अब भी

विश्वास नहीं हो रहा था

कि मेरी माई मुझको

इस तरह

मँझधार में छोड़ देगी I

उनकी मन-स्थिति

कुछ ऐसी थी जैसे:

“जरा-सी

आहट भी

होती है

तो दिल कहता है…

कही ये वो तो नहीं…

कही ये

वो…तो…नहीं

कही ये वो तो नहीं “

तभी

सन्नाटे को चीरती हुई

‘थप-थप’ की आवाजें

कानों में पड़ती है

लग रहा था,

मानो कोई दरवाजे पर

दस्तक दे रहा हैI

द्वारकाजी की पत्नी

कहती है,

“भगतजी उठो,

देखो,

दरवाजे पर कोई है I

शायद कोई भगत

राह भटक कर

इधर आगया हैI”

अब फिर किसी भगत की

खरी-खोटी

सुनने को मिलेगी,

यह सोच कर,

न चाहते हुए भी

द्वारकाजी

बुझे मन से

उठते है,

और जाकर

दरवाजा खोलते है I

दरवाजा खोलते ही

वे दंग रह जाते है I

लाल चुनरिया में सजी-धजी

वही माई

उनके दरवाजे पर खड़ी है,

जिनके दर्शन

हर रोज

वे

झुंझुनू-मंदिर में

किया करते थे I

जिनको रोज वे

अपने घर आने का

न्योता दिया करते थे I

जिन्होंने उनसे

कहा था,

कि

अगली अमावस की रात को

वह मेरे घर आयेगी

और रात का भोजन भी

मेरे साथ करेगी I

वे उनके अनुपम सोन्दर्य को

निहारते ही रह गये

उनके माथे की बिंदिया

चंदा सी चमक रही थी I

उनके हाथों में रची मेहंदी से

पूरा घर महक रहा था I

उनके मुख-मंडल का तेज,

चारों दिशाओं को

प्रकाशित कर रहा था I

ऐसा लग रहा था,

मानो भोर का सूरज

आधी रात को ही

द्वारकाजी के घर से निकल रहा हैI

द्वारकाजी को

समझते देर न लगी

वे समझ गये,

कि दादीजी

उनके घर आ गई है I

वे घुटनों के बल बैठ गये I

अपना  सर

उनके चरणों में रख दिया

उनका दिल भर आया

वे फूट-फूट कर

रोने लगे

दादीजी

अपने हाथों से

उनको उठाती है I

अपने कलेजे से लगाती है I

अपने आंचल से

उनके आंसू

पोंछने लगती है I

द्वारकाजी धीरे-धीरे

सहज होने लगते है

लेकिन उनके मन में

एक बात

अब भी खटक रही है I

वे रो-रो के,

माई से कहते है,

भक्त रो-रो के

माई से

कहने लगा

भक्त रो-रो के

माई से

कहने लगा

अब आई हो,

पहले क्यों आई नहीं,

तेरे भक्तों ने

तेरे भक्तों ने

मुझको रुलाया बहुत,

सताया बहुत

थोड़ी भी दया,उनको आई नहीं

भक्त रो-रो के I

द्वारकाजी

दादीजी से पूछते है

“हे माई,

यह तो बता,

तुम अब आई हो,

पहले क्यों नहीं आई?

अगर पहले आ जाती

तो तेरी और मेरी

दोनों की बात बनी रहती

द्वारकाजी कहते है,

“मुझे इतना तो पता था,

कि तुम ज़रूर आओगी I

मैंने तो बचपन से

यही सुना है कि

तुम अपने भक्तों की

बात रखती हो,

उनकी लाज रखती हो

उनसे किये वादे

पूरे करती हो

लेकिन

तुम अपना वादा

इस तरह पूरा करोगी

यह देख कर मैं हैरान हूं

अब दादीजी कहती है

द्वारकाजी सुनो,

तुम मुझे झूठा दोस मत दो

“मैं तो

गोधूली से ही

तेरे घर की

चोखट पर खड़ी हूँ I

तुझसे मिलने के लिए

बैचेन हूँ I

उतावली हूँ I

घर से भूखी-प्यासी

यह सोचकर निकली थी,

कि आज तो

द्वारकाजी के घर जाकर कर ही

भोजन करुगी I

लेकिन

मेरा नसीब देखो

आधी रात बीत गई

मै तो अबतक

भूखी-प्यासी ही

तेरे घर की

चोखट पर खड़ी हूँ

यह सोच-सोच कर

मन को समझाती रही हूँ,

कि कभी तो

मेरे भक्त को

मेरा ख्याल आएगा I

उसे याद आएगा

कि आज उसने मुझे

अपने घर

भोजन के लिए बुलाया है

लेकिन तुम तो

बड़े ही

खुदगर्ज़ निकले I

अपनी प्रसन्नता सुन-सुन कर

अपने अहम में चूर थे I

मैंने यह किया,

मैंने वह किया

में उलझ कर,

तुम तो मुझे

भूल ही गये I”

द्वारकाजी पर मानो

बिजली सी गिरी

उनको अपनी भूल का

एहसास हो गया I

वे कहने लगे हे माई,

“मैं लोगों की बातें

सुन-सुन कर

भटक गया था I

मुझे तो होश ही नहीं रहा,

कि आज आपने

मेरे घर आना है I

मुझे तो होश तब आया

जब लोग मुझसे पूछने लगे

कि आधी रात हो गई द्वारकाजी

थारी दादीजी

कहां रह गई ?

अबतक आई क्यों नहीं ?

मैं अपने अहंकार मे

इस कदर डूब गया था I

कि

ऐन मोके पर

मैं आपको भूल गया

उनको कबीर साहिब की

कही बात याद आगई

कबीर साहिब कहा करते थे

“किया कराया सब गया,

जब आया अहंकार”

वह आत्मग्लानी से भर उठा I

और बार-बार दादीजी से

अपनी भूल के लिए

क्षमा मांगने लगा I

दादीजी ने द्वारकाजी को

क्षमा कर दिया

कहने लगी, “द्वारका

मैं तेरी बरसों की भक्ति से

खुश थी,

तभी तो

भूखी-प्यासी रह कर भी,

तेरे घर की

चोखट पर खड़ी रही I

जो भूल तुझसे हुई है,

उसे तो

मैं कब का

भूल चुकी I

कुछ ही देर मे

तेरे घर

लोग

फिर से जमा होगें I

वें तुझसे पूछेगे,

कि

आधी रात को

द्वारकाजी

आपके घर

यह प्रकाश कैसा था ?

और

आपके

पूरे घर में

यह मेहंदी की खुशबू

कैसी है?

तो

उन से कहना

मैं

आई थी I

यह प्रकाश दादीजी का था I

और

यह खुशबू भी

उनके हाथों में रची

मेहंदी की है I

लोगों में

तेरा खोया विश्वास

फिर से लोट आएगा I”

मेरे प्रिय भक्त-जनों

एक बार प्रेम से बोलो

II जय दादी की II जय दादी की II

जीवन में अहंकार 

ईश्वर-प्राप्ति में

सबसे बड़ी रूकावट है I

मन के अंदर ‘मैं’ का आना,

हमें ईश्वर से मिलने नहीं देता I

एकबार

कौशल्या माता के पूछने पर

भगवान श्रीराम ने कहा था 

हे माते,

रावण को मैंने नहीं मारा

उसके ‘मैं’ ने ही उसे मार डाला I

भक्त द्वारकाजी

झुंझुनू निवासी

श्री द्वारका दास जी तुलस्यान थे I

वे

दादीजी के

सच्चे भक्त थे

रोज नियम से

मंदिर जाते थे I

और उनकी

पूजा-अर्चना

किया करते थे

वे ता-उम्र,

मंदिर के बाहर

चौकी लगाकर

मंदिर के विकास कार्यों में

अपना सहयोग देते रहे,

और इसके लिए

लोगों को भी प्रोत्साहित करते रहे I

कुछ साल पहले तक

दादीजी के झुंझुनू-मंदिर में

एक पुस्तकालय हुआ करता था I 

उसमे द्वारकाजी का

एक बड़ा सा

छायाचित्र लगा था I

वक़्त का फेर देखिए

अब न तो वह पुस्तकालय रहा

और न ही उसमें लगा

उनका वह छायाचित्र I

दोनों ही

अपने स्थान से

हटा दिये गये है I

झुंझुनू के छावनी बाज़ार में,

मोदी गढ़ के सामने स्थित 

वह हवेली

और

उसमें बने मकानात

आज भी है मौजूद है

जिसमें एकबार

भक्त द्वारकाजी के

बहुत अधिक

बीमार पड़ जाने पर

दादीजी स्वयं

उनसे मिलने आई थी I

उनकी धर्म-पत्नी

श्रीमती मणि बाई

अक्सर इस घटना का

जिक्र किया करती थी I

मेरे प्रिय भक्त-जनों,

मुझे पूरी उम्मीद है,

आस्था और विश्वास पर टिकी

भक्त द्वारकाजी के साथ घटित

इस घटना का वीडियो

आपको 

जरुर पसंद आया होगा

यदि आप दादीजी के

सच्चे भक्त है

तो

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यह विडियो मेरे पूज्यनीय पिताश्री महान समाजसेवी झुंझुनू निवासी श्री बनवारी लाल जी तुलस्यान और माताश्री श्रीमती पाना देवी को समर्पित है, जिनके उच्च आदर्श मेरे दिलों-दिमाग में हमेशा तरोताज़ा रहते है I

एकबार फिर से,

प्रेम से बोलो

II जय दादी की II जय दादी की II

(1) तेरे दरबार में दादी

मेरे प्रिय भक्त-जनों…

दादीजी…झुन्झुनुवाली के…

यूट्यूब चैनल पर…

आपका स्वागत है.

दोस्तों यह मात्र एक भजन नहीं है.

यह एक भक्त के मन मे

अपनी दादीजी के प्रति

आत्मविश्वास (confidence) है,

कि वह मेरी है,

मेरे साथ है,

चाहे दुःख हो या सुख

हमेशा मेरे साथ रहेगी,

मेरे लिए बैठी है,

मेरा कोई अहित नहीं होने देगी,

और अगर कुछ हो भी गया तो

वह अपने आप संभाल लेगी.

मुझे चिंता करने की,

घबराने की

कोई जरुरत नहीं है.

भक्त कहता है-

 

तेरे दरबार में दादी,

ओ…दादी…ओ…

ओ…दादी…रे…

तेरे दरबार में दादी…

मैं अक्सर रोज आता हूं

ओ…दादी…ओ…

ओ…दादी…रे…

मैं अक्सर रोज आता हूं

यहाँ अपना-सा लगता है,

मैं दुनिया भूल जाता हूं

तेरे दरबार में दादी…

 

न कोई डर यहाँ मुझको,

ओ…दादी…ओ…

ओ…दादी…रे…

न कोई डर यहाँ मुझको,

न कोई फिक्र सताती है,

यहाँ हरवक़्त मैं तुझको,

अपने संग पाता हूं

तेरे दरबार में दादी…

 

जो विपदा आगई कोई,

ओ…दादी…ओ…

ओ…दादी…रे…

जो विपदा आगई कोई,

हल तू ही सुझाती है

सभी कुछ छोड़ कर तुझ पर

मैं मीठी नींद सोता हूं

तेरे दरबार में दादी…

 

मुझे खुश करने के खातिर,

ओ…दादी…ओ…

ओ…दादी…रे…

मुझे खुश करने के खातिर,

तू अक्सर हार जाती है

यही ममता तेरी मुझको

यहाँ तक खींच लाती है.

तेरे दरबार में दादी…

 

अंतरा

न.तेरी चोखट छोड़ूगा

ओ…दादी…ओ…

ओ…दादी…रे…

न.तेरा चोखट छोड़ूगा

अडिग हूं अपने वादे पर

पालूंगा एक.दिन मैं तुझको

बड़ा विश्वास है मन मे

तेरे दरबार में दादी…

 

हिन्दू धर्म की

एक महत्वपूर्ण मान्यता है,

गरुड़ पुराण कहता है,

मृत्यु के बाद

हमारी आत्मा

गऊमाता की पूंछ पकड़कर

वैतरणी नदी पार कर

मोक्ष को प्राप्त करती है.

भक्त कहता है…

 

पकड़ कर पल्लू मैं तेरा

ओ…दादी…ओ…

ओ…दादी…रे…

पकड़ कर पल्लू मैं तेरा

वैतरणी पार कर लूगा

बड़ा विश्वास है मन मे

मैं एक दिन तुझको पालूँगा

तेरे दरबार में दादी…

II जय दादी II जय दादी की II

(2) यो मनड़ो मान ना…

मेरे प्रिय भक्त-जनों…

दादीजी…झुन्झुनुवाली के…

यूट्यूब चैनल पर…

आपका स्वागत है.

मैं…विमल तुलस्यान दादीजी का…

एक छोटा-सा भक्त हूं…

मेरे मन को न जाने…

क्या हो गया है…

इसे हर वक्त

झुंझुनू जाने की

लगी रहती है…

मैं इसे

बार-बार

समझा कर

थक चुका हूं…

कि भाई रोज-रोज

झुंझुनू  जाना

संभव नहीं…

इससे तो हमारा

सारा धंदा-पानी

चोपट हो जायेगा…

लेकिन यह

मेरी बात मानने को

तैयार नहीं…

मैं अपने मन की पीड़ा

आप लोगों के सामने…

दादीजी के कह रहा हूं-

 

यो मनड़ो मान ना…

यो मनड़ो मान ना…

बार-बार एक जिद है इसकी,

चालो झुंझुनू धाम,

यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,

माई से मिल आ…वा…,

ओ.दर्शन कर आ…वा…

आपणी कह आ…वा…

माई की सुन आ…वा…

यो देव तर्क हजार

ना मा…न मेरी कोई बात

यो मनड़ो मान ना…

 

 

चीला-पुड़ा को घोल बनाकर,

हाथों से निज भोग बनाकर,

बोल…चालो झुंझुनू धाम,

यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,

माई को भोग लगा…आवा,

या, जिद इसकी हर बार,

चालो जी, चालो झुंझुनू धाम,

ना मा…न मेरी कोई बात

यो मनड़ो मान ना…

 

भांति-भांति के फूल बटोरे,

हाथों से निज इनको पिरोवे

बोल,चालो झुंझुनू धाम,

यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,

माई न पहना…आवा…

या, जिद इसकी हर बार,

यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,

चालो जी, चालो झुंझुनू धाम,

ना मा…न मेरी कोई बात

यो मनड़ो मा…न ना…

 

अंतरा

गाढ़ी-रचनी मेहंदी लाकर

होथों से निज घोल बना कर,

बोल, चालो झुंझुनू धाम,

यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,

माई का मांडा दोनों हाथ…

या, जिद इसकी हर बार,

चालो जी, चालो झुंझुनू धाम,

ना मा…न मेरी कोई बात

यो मनड़ो मा…न ना…

 

सुंदर सी एक चुनरी लाकर,

गोटो, मोती, तार लगाकर,

बोल,चालो झुंझुनू धाम,

यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,

माई को उढा…आवा

या, जिद इसकी हर बार,

चालो जी, चालो झुंझुनू धाम,

ना मा…न मेरी कोई बात

यो मनड़ो मान ना…

 

बैध बुलाया, हकीम दिखाया,

रोग न कोई पकड़ न पाया,

अब थे ही करो उपचार,

दादीजी थे ही करो उपचार,

ना मा…न मेरी कोई बात

यो मनड़ो मान ना…

 

बार-बार एक तुझको पुकारे,

लेकर तेरा नाम,

यो, बोल, चालो झुंझुनू धाम,

चालो जी, चालो झुंझुनू धाम,

ना.मा.न मेरी कोई बात

यो मनड़ो ना मान…

II जय दादी II जय दादी की II

(3) मेरा जी नहीं लगता

मेरे प्रिय भक्त-जनों…

दादीजी…झुन्झुनुवाली के…

यूट्यूब चैनल पर…

आपका स्वागत है.

एक बहुत ही सुंदर भजन है,

जिसमे एक भक्त

नाना-प्रकार के

यत्न करता है,

ताकि किसी तरह

दादीजी से

उसका मिलन हो जाए.

वह उनके सामने

कई प्रकार के

विकल्प रखता है

ताकि माई कि

उसपर कृपा हो जाए.

आइये,

सुनते है भजन को,

कि भक्त के मन मे

क्या चल रहा है-

 

मेरा जी नहीं लगता दादीजी,

तुझसे मिलने मैं आऊ

मेरा जी नहीं लगता दादीजी,

तुझसे मिलने मैं आऊ

जब से होश संभाला मैंने,

तुझको अपना माना,

और न कोई दूजा मेरा,

बस तुझको ही जाना

जब से लागी लगन जिया में,

ओ लागी रे…ओ माई ओ

जब से लागी लगन जिया में,

दूर नही रह पाऊ

मन मिलने को व्याकुल मेरा,

कैसे चैन मैं पाऊ.

ओ माई रे…ओ माई ओ

मेरा जी नहीं लगता दादीजी,

तुझसे मिलने मैं आऊ…

भक्त कहता है-

मैं फूल बनजाऊ,

तेरी माला मे गूँथ जाऊ,

मैं फूल बनजाऊ रे,

तेरी माला मे गूँथ जाऊ,

जब मुझ पे नज़र पड़ेगी,

मेरी याद तुझे आयेगी.

जब याद मेरी आयेगी,

तू दोड़ी चली आयेगी

मैं यही तो चाहता दादीजी

तुझसे मिल चैन मैं  पाऊ.

मेरा जी नहीं लगता दादीजी,

तुझसे मिलने मैं आऊ…

 

मैं मेहंदी बनजाऊ,

तेरे हाथों में रच जाऊ,

मैं मेहंदी बनजाऊ रे,

तेरे हाथों में रच जाऊ,

जब मेहंदी को देखोगी ,

मेरी याद तुझे आयेगी.

जब याद मेरी आयेगी,

तू दोड़ी चली आयेगी

मैं यही तो चाहता दादीजी,

तुझसे मिल चैन मैं  पाऊ.

मेरा जी नहीं लगता दादीजी,

तुझसे मिलने मैं आऊ…

 

अंतरा

मैं बिंदिया बनजाऊ,

तेरे माथे पे सज जाऊ,

मैं बिंदिया बनजाऊ रे,

तेरे माथे पे सज जाऊ,

मैं काजल बन जाऊ,

तेरी आँखों मे बस जाऊ

मैं काजल बन जाऊ रे,

तेरी आँखों मे बस जाऊ

जब-जब दर्पण देखोगी,

मेरी याद तुझे आयेगी.

जब याद मेरी आयेगी,

तू दोड़ी चली आयेगी

मैं यही तो चाहता दादीजी

तुझसे मिल चैन मैं  पाऊ.

मेरा जी नहीं लगता दादीजी,

तुझसे मिलने मैं आऊ…

 

मैं पायल बनजाऊ,

तेरे पावों से बंध जाऊ,

मैं पायल बनजाऊ रे,

तेरे पावों से बंध जाऊ,

जब-जब पायल बा…जेगी,

मेरी याद तुझे आयेगी.

जब याद मेरी आयेगी,

तू दोड़ी चली आयेगी

मैं यही तो चाहता दादीजी

तुझसे मिल चैन मैं  पाऊ.

मेरा जी नहीं लगता दादीजी,

तुझसे मिलने मैं आऊ…

 

भक्त कहता है,

जब मेरी माँ को,

कोई जरुरी काम

करना होता था,

तो वे अपने पल्लू से

एक गांठ बांध लेती थी,

यह गांठ उनको

उस जरुरी काम को

करने की याद

दिलाती रहती थी.

भक्त भी

दादीजी से कहता है,

हे माई,

मैं भी तेरे पल्लू की

गांठ बन जाऊ,

ताकि तुझे याद रहे

कि तेरा एक भक्त

तुझे याद करता है.

तुझसे मिलना चाहता है.

भक्त कहता है-

 

मैं तेरा पल्लू बनजाऊ,

तेरे पल्लू से बंध जाऊ,

मैं पल्लू बनजाऊ रे,

तेरे पल्लू से बंध जाऊ,

जब पल्लू पर नज़र पड़ेगी,

मेरी याद तुझे आयेगी.

जब याद मेरी आयेगी,

तू दोड़ी चली आयेगी

मैं यही तो चाहता दादीजी

तुझसे मिल चैन मैं  पाऊ.

मेरा जी नहीं लगता दादीजी,

तुझसे मिलने मैं आऊ…

 

हिन्दू धर्म की

एक महत्वपूर्ण मान्यता है,

गरुड़ पुराण कहता है,

मृत्यु के बाद

वैतरणी नदी पार कर

मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है.

भक्त कहता है…

पल्लू पकड़ के एक दिन तेरा

वैतरणी पार कर लूँगा

विश्वास घना है मन के मा…ई

एक दिन तुझको पालूँगा

(4) तेरा बुलावा आता रहे माँ

मेरे प्रिय भक्त-जनों…

दादीजी…झुन्झुनुवाली के…

यूट्यूब चैनल पर…

आपका स्वागत है.

दादीजी जी का

एक भक्त है,

वह कहता है,

हे माई,

मानाकि तेरे भक्त अनेकों है,

और वें तेरा

पूरा-पूरा ख्याल रखते हैं.

लेकिन तेरी सुध-बुध लेना

मेरी दिनचर्या  बन गई है.

जबतक मैं अपनी आखों से

तुझे देख न लू,

मुझे चैन नहीं पड़ता,

मुझे नींद नहीं आती.

भक्त चाहता कि

कभी कीर्तन के बहाने,

कभी तेरे मंगल पाठ के बहाने

या फिर किसी और बहाने

तेरे दरबार मे आने का

मौका मिलता रहे

और मैं अपनी आखों से

तुझे देख सकू,

सब-कुछ देख सकू

तेरे हाल-चाल जान सकू.

भक्त कहता है-

 

तेरा बुलावा आता रहे माँ,

कुछ तो ऐसा होता रहे,

तेरा बुलावा आता रहे माँ,

कुछ तो ऐसा होता रहे,

हाल तेरा क्या, जानसकू मैं,

दिल में तसल्ली होती रहे.

तेरा बुलावा आता रहे माँ,

 

जैसे एक पुत्र/बेटा…

रातको… अपने काम-धंदे

या नोकरी से घर लोटकर…

स्वयं खाना खाने से पहले

अपनी पत्नी से पुछता है…

कि मम्मी-पापा ने…

खाना खाया कि नहीं…

ठीक इसी तरह…

भक्त को भी…

इस बात की चिंता

सताती रहती है…

कि कहीं उसकी माई,

उसकी दादीजी,

भूखी-प्यासी तो

नहीं बैठी…

वह कहता है…

भूखी-प्यासी तो नहीं बैठी,

भोग तुझे नित लगता रहे,

देखलू अपनी आखों से तो,

दिल में तसल्ली होती रहे.

 

हाथों मे मडी मेहंदी

और उसकी मनमोहक महक

दादीजी का मन मोह लेती हैI

भक्त भी चाहता है कि

उसकी दादीजी के हाथों में

हमेशा मेहंदी मडी रहेI

भक्त कहता है-

 

अंतरा

बिन मेहंदी के तो नहीं बैठी,

तेरे हाथों में मेहंदी रचती रहे

देखलू अपनी आखों से तो,

दिल में तसल्ली होती रहे.

 

दादीजी को मस्त-मस्त फूलों का गजरा

बहुत पसंद है, वह कहता है…

 

बिन गजरे के तो नहीं बैठी,

गजरे में तू सजती रहे

देखलू अपनी आखों से तो,

दिल में तसल्ली होती रहे.

 

दादीजी को लाल-चुनरिया

बहुत पसंद है, वह कहता है…

 

लाल चुनरिया गोटे वाली,

हर पल तेरे सर पे रहे,

देखलू अपनी आखों से तो,

दिल में तसल्ली होती रहे.

 

इसीलिए, भक्त कहता है…

तेरा बुलावा आता रहे माँ,

कुछ तो ऐसा होता रहे,

हाल तेरा क्या, जानसकू मैं,

दिल में तसल्ली होती रहे.

तेरा बुलावा आता रहे माँ,

 

(5) छोड़दी सारी दुनिया

मेरे प्रिय भक्त-जनों…

दादीजी…झुन्झुनुवाली के…

यूट्यूब चैनल पर…

आपका स्वागत है.

छोड़दी सारी दुनिया तेरे लिए,

अबतो आओ दादीजी मेरे लिए…2

जिंदगी का तो कोई भरोषा नहीं,

मेरी जिंदगी है तेरे लिए,

छोड़दी सारी दुनिया तेरे ही लिए…

 

मन का मन से मिलन तो हुआ है मगर,

तुझे आखों से अबतक तो देखा नहीं…2

तेरे गजरे की खुशबू तो आती है मगर,

तुझे गजरे में अबतक तो देखा नहीं…2

तेरी मेहंदी की खुशबू तो आती है मगर,

तेरे हाथों मे मेहंदी तो देखी नहीं…2

मानाकि मैं तेरे लायक नहीं,

(भक्त कहता है,

बहुत दोष है मुझमें,

सांसारिक पुरुष हूं,

जीवनयापन के लिए

अनेकों झूठ-सांच करता हूं,

लेकिन फिर भी…)

हूं भक्त तो तेरा ही, ये झू…ठ नहीं

मानाकि मैं तेरे लायक नहीं,

हूं भक्त तो तेरा ही, ये झूठ नहीं,

 

प्यासी है अखियाँ, बुलाती तुझे,

यूं इनको रुलाना तो ठीक नहीं…2

मेरे सब्र का बांध ना टूटे कभी,

तेरा यूं ना आना तो ठीक नहीं…2

एकबार तो देखू जी भर के तुझे,

इतना सा मांगू, बेजा तो नहीं

(भक्त कहता है,

धन-दोलत तो तुझसे मांगा ही नहीं,

बस इतना सा मांगा,

एकबार तुझसे मिलना हो जाये,

चाहे तू आजा या फिर मुझको बुलाले)

छोड़दी सारी दुनिया तेरे ही लिए…

 

(6) जब हो जाये असहाय

मेरे प्रिय भक्त-जनों…

दादीजी…झुन्झुनुवाली के…

यूट्यूब चैनल पर…

आपका स्वागत है.

जब हो जाये असहाय,

बिगड़ जाए तेरी कोई बात,

तेरा कोई भी… ना देवे साथ,

तेरी कोई भी… ना सुने पुकार,

झुंझुनू हो आना…

झुंझुनू हो आना,

दादीजी देगी तेरा साथ,

बनेगी तेरी बिगड़ी बात,

एकबार आजमाना,

झुंझुनू हो आना…

झुंझुनू हो आना,

 

जब बन जाये तेरी बात,

संवर जाये तेरी बिगड़ी बात,

दिल में जब होजाये विश्वास,

झुंझुनू हो आना…

झुंझुनू हो आना,

दादीजी से रुबरु मिलकरके

शुक्रिया कह आना,

शुक्रिया कह आना,

झुंझुनू हो आना…

झुंझुनू हो आना,

II जय दादीकी II

(1) मैं तो तुझसे थोड़ा सा मांगू , दादी तू झोली भर देती है,

कैसे चुकाऊ कर्ज मैं तेरा, तू तो बड़ी दरियादिल है I

जीवन की राहों में जब भी , थक कर बैठा दादीजी,

टूटे दिल को तूने थामा, संकटमोचक बन मेरी II

 

(2) लेलो… मुझको भी शरण में मेरी माई, मैं कब से तेरे द्वार खड्यों,

मोह-माया के जाल में फंस कर, भूल गया था तुझको,

चैत हुआ तो ले डूबी थी, सारी उमरिया मुझको,

भूल-चूक अब माफ भी करदो, लेलो शरण में मुझको

 

धन-दौलत कुछ ना मांगूं मैं, साथ नहीं कुछ जाये,

मैं तो बस इतना-सा मांगूं , मेरे दिल में तू बस जाये

 

(3) जैसे ही दादी तेरे द्वार पे पहुंचा, देखा एक नजारा,

बदली हार, जीत में मेरी, मिल गया तेरा सहारा I

ओ दादी, मिल गया तेरा सहारा

हाथ पकड़ कर दादी बोली, अब कैसा है, तू बेटे

आँखों में भर आया पानी, मुख से बोल ना फूटे

 

(4) बार-बार दिल कहे दादीजी, ना करना इंकार,

आजाओ दादीजी, आजा…ओ मेरे द्वार,

आँसू झलके, बार-बार तुझे याद करे माँ,—(2)

नाम तेरा ले-लेके बोले…

आजाओ दादीजी, आजा…ओ मेरे द्वार,

दिल में ऐसी अगन लगी है, बुझा न पाऊँ

जब तक तुझसे न मिल पाऊँ, चैन न पाऊँ,

दुनिया सारी फीकी लाग्

मन घबरावे

द्वार खरयों थारो बालक दादी, तुझे पुकारे

नाम तेरा ले-लेके बोले…

आजाओ दादीजी, आजा…ओ मेरे द्वार,

(5) मेरे साथ वो बैठी है, मेरे दिल की सुनती है,

विपदा में अगर होऊ, मेरा हाथ पकडती है,

उसको मैं ना भूलू, मेरी बिगड़ी बनाती है,

(6) म्हान हिवड़ स लगाले म्हारी माय, मैं आयो थारे द्वार खड्यों…2

रात-रात भर नींद न आवे, सुमरू थारो नाम,

तड़प-तड़प कर प्रेम में थार, हो गयो मैं बेहाल

दिल भी ख़ाली-ख़ाली सो, लाग् म्हारी माय, मैं आयो थार द्वार खड्यों

म्हान आँचल स लगाले म्हारी माय, मैं आयो थार द्वार खड्यों

मन में भाव भरयों है म्हारे, तुझसे मिलना हो जाये,

एक बार भी मिल लू तुझसे, मन हल्का हो जाये

म्हान आँचल स लगाले म्हारी माय, मैं आयो थार द्वार खड्यों

(7)

मेरे संग-संग ही रहना, मुझसे दूर नहीं जाना

 

यह अर्ज मेरी है दादीजी, इसको ना झुठलाना I

(8)

तेरी ध्वजा उड़े आसमान, बहुत ही अच्छा लगता है

इसे देख-देख दादीजी, मन मेरा पुलकित होता है I


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Vimal Kumar Tulsyan is the Founder of CUET NOW, an educational platform focused on CUET UG preparation. He has more than 10 years of teaching experience in Reasoning and General Aptitude.

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By Vimal Kumar Tulsyan

Vimal Kumar Tulsyan is a commerce graduate with more than 10 years of teaching experience in reasoning and aptitude. He founded the CUET NOW in September 2023. Its website, cuetnow.com provides students with free CUET UG GAT preparation resources and important MCQs to help them secure excellent marks in the CUET.